‘Jaadon Ki Neend’, a poem by Devesh Path Sariya

जाड़ों की नींद से
जब सुबह जगो तो
कुछ टूटा-टूटा लगता है

मधुमक्खी का डंक हो
जिसे खींच लेगी खटिया
कुछ देर और सोने से

पैरों के तलुओं में गर्मी आएगी
आँखों की थकान छू होगी
बिस्तर कुछ यूँ फुसलाता है

और डुब-डुब करती आँखें
डूब जाती हैं,
अतिरिक्त नींद के सपनों में…

Previous articleलेटलतीफ़
Next articleसुधांशु रघुवंशी की कविताएँ
देवेश पथ सारिया
हिंदी कवि। कथेतर गद्य लेखन एवं कविताओं के अनुवाद में भी सक्रिय। सम्प्रति: ताइवान में खगोल शास्त्र में पोस्ट डाक्टरल शोधार्थी। मूल रूप से राजस्थान के राजगढ़ (अलवर) से सम्बन्ध। साहित्यिक पत्रिकाओं में प्रकाशन: हंस, नया ज्ञानोदय, वागर्थ, कथादेश, कथाक्रम, परिकथा, पाखी, आजकल, बनास जन, बया, मधुमती, कादंबिनी, समयांतर, समावर्तन, जनपथ, नया पथ, कथा, आधारशिला, उद्भावना, दोआबा, बहुमत, परिंदे, कविता बिहान, प्रगतिशील वसुधा, साखी, अकार, गाँव के लोग, विश्वगाथा, ककसाड़, गगनांचल, निकट, अक्षर पर्व, मंतव्य, मुक्तांचल, रेतपथ, कृति ओर, शुक्रवार साहित्यिक वार्षिकी, उम्मीद, अनुगूँज, कला समय, पुष्पगंधा आदि । समाचार पत्रों में प्रकाशन: राजस्थान पत्रिका, दैनिक भास्कर, प्रभात ख़बर, दि सन्डे पोस्ट। वेब प्रकाशन: सदानीरा, जानकीपुल, हिंदवी, पोषम पा, कविता कोश, हिन्दीनेस्ट, इंद्रधनुष, अनुनाद, बिजूका, पहली बार, समकालीन जनमत, मीमांसा, शब्दांकन, कारवां, साहित्यिकी, अथाई, हिन्दीनामा, द साहित्यग्राम, लिटरेचर पॉइंट।