मकड़ी के जालों से ज़ियादा प्रभावित किसी और चीज़ से नहीं हुआ मैं। हर बार उसे झाड़ू से या झालर से झाड़कर हटा दिया जाता है लेकिन विस्मयी प्रतिभा की धनी मकड़ी, हर बार चुपचाप नया जाल बुन लेती है। कुछ लोगों का मानना है कि ये जालें घरों को मकानों में तब्दील कर देते हैं। जाले वहाँ सबसे पहले लगते हैं जहाँ हमारे हाथ सफ़ाई के लिए नहीं पहुँचते। जाले कुछ और नहीं, बन्द पड़ गए संवाद हैं, दिलों में उठी कोई टीस हैं, वो आँसू हैं जो कभी पलकों से मोती बन लुढ़के नहीं और गालों के स्पर्श से वंचित रह गए। रिश्तों में जहाँ तू-तू मैं-मैं ख़त्म हो जाए, वहाँ लगते हैं जाले। ये जाले बन जाते हैं एक लम्बे अध्याय के बाद जिसमें भारी मात्रा में होती है अनभिज्ञता, जड़ता, अंतर्हित लालच, कृत्रिमता, अपवित्रता और अकृतज्ञता।

मैं इस बात से इंकार करता हूँ और ऊपर कही गयीं सारी बातों को ख़ारिज करता हूँ क्योंकि जाल बनाना एक प्रतिभा है। मैं इसे अकेलापन नहीं, एकांत का नाम देता हूँ। इस एकांत में दर्द तो है पर घुटन नहीं है—कुछ दर्द मज़ा देते हैं और जीने का सबब भी बनते हैं। मुझे भी अब एकांत की तलाश है—मैं अब समय नहीं देना चाहता किसी को। बीते दिनों बहुत-सी बातें दिलों में नश्तर-सी चुभीं और काले बादलों ने ख़यालों पर डेरा जमाए रखा। बादल गर बरस जाएँ तो चैन भी मिले पर गाँव के ऊपर से बादलों का बिना बरसे चले जाने का दर्द तो बस वहाँ के लोग ही जानें।

मेरे घर पर बारिश नहीं हुई, मेरे तरीक़ों को कमज़ोरी का नाम दिया गया, ख़ुद के कामों में उलझे लोगों को ख़ुद पर संदेह करना पड़ा। कल यूँ ही अचानक मुझसे एक लड़की ने पूछा कि क्या मैं अपने सपनों की दुनिया पर ताला लगाकर छूमंतर हो जाऊँ? मेरा जवाब था, सुनो नहीं… अपनी मेहनत को आबाद और ज़िंदाबाद रखो।

कभी अपने सपनों को किसी सन्दूक़ में बन्द करके उसकी चाबी इतनी दूर न फेंको कि दुनिया का सबसे अच्छा ग़ोताख़ोर भी उसे ढूँढ न पाए। क्या हुआ जो लोगों ने साथ न दिया, तुम ख़ुद का साथ दो और हर रोज़ अपने सपनों को जिओ।

मैं भी अब अपने सपनों को जीता हूँ। लोग आपको हर क़दम पर आँकेंगे। मैं समय देना बन्द कर चुका हूँ, समय देना बहुत भारी इन्वेस्टमेंट है, तोहफ़े देने से भी भारी। लोग इसे जाले का नाम दे सकते हैं, मैं कहता हूँ ये ‘मेन्टल पीस’ है, सबसे ज़रूरी चीज़। तुम सब अपना मेन्टल पीस तलाश करो अपने सपनों को ताला लगाकर बेचैनियों के समंदर में कूदने से ख़ुद को रोक लो।

माधव राठौड़ का गद्य 'मुझे विशालकाय बूढ़े दरख़्त हॉन्ट करते हैं'

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