जब मैं आया था तेज़ क़दम झुके माथे के बावजूद
संकरी गलियों और चौड़े रास्तों पर
लम्बी-रुलाइयों के अलावा सिसकना भी सुनायी दे जाता था
कमज़ोर आवाज़ को पहचान की हद तक
उठाने का हल्ला था

लोक-परलोक की धुन बहुत बजती थी हवा में
सच्चा शोक बिना तर्क के सोने नहीं देता था
अकाल में मृत्यु के अलावा पूर्व जन्म का कोई फल नहीं दिखता था

पर समय की कोई सांस्कृतिक सियासत थी
कि दो अकेले भी दोस्त हो जाते थे
भले ही समूह झगड़ रहे हों

अब आवाज़ें बुलन्द और सड़कें चौड़ी हैं
रुलाई की जगह ग़ुस्सा है
सिसकने की जगह हल्ला नहीं हल्ला-बोल है
शोक ख़ानदानी बदले में बदल गए हैं

माथे
धर्म और जाति के लाभ से झुके हैं
विनम्रता से नहीं
नये-नये प्रकार के ग़ुरूर असहमति को घृणा में
घृणा को विचारधारा में बदल रहे हैं

समूहों में दोस्ती हो रही है
खुले विचारों वाले अकेले व्यक्तियों के ख़िलाफ़।

लीलाधर जगूड़ी की कविता 'ईश्वर का प्रश्न'

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लीलाधर जगूड़ी
लीलाधर जगूड़ी साहित्य अकादमी द्वारा पुरस्कृत हिन्दी कवि हैं जिनकी कृति 'अनुभव के आकाश में चाँद' को १९९७ में पुरस्कार प्राप्त हुआ।

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