दो चेहरे उगे होते हैं उसके
जब वो कविताएँ लिखता है,
दिखते हैं दोनों ही मुझे
एक दूसरे में अझुराए हुए,
एक उगा होता है
स्याही लगे हाँथों की उंगलियों में,
दूसरा छुपा होता है
पन्नों का लिहाफ ओढ़े
शब्दों और मात्राओं के बीच
कवि की कभी अपनी
एकाकी पहचान नहीं होती…

वो एकान्त की मिट्टी मिलते ही
अपनी ही परछाइयों के
रंग बिरंगे पुतले बनाता है
और ढक देता है उन्हें
दहकते अक्षरों और
कुछ पन्नों के ताप के नीचे
ताकि तारिखें बदलने के बाद भी
टूटे ना उसकी परछाइयाँ

और वो जी भर के मिल सके
खुद से…

✍️
30/12/2018

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