अपने बर्फ़ जैसे हाथों से वाहिद ने गर्दन से उलझा हुआ मफ़लर निकाला और सफ़िया की ओर फेंक दिया। पलक-भर वाहिद की ओर देखकर सफ़िया ने मफ़लर उठाया और उसे तह करती हुई धीमे स्वर में बोली, “क्या मीलाद में गए थे?”

वाहिद ने बड़े ठण्डे ढंग से स्वीकृतिसूचक सिर हिलाया और पास की खूँटी में कोट टाँग खिड़की के पास आया। खिड़की के बाहर अन्धेरा था, केवल सन्नाटे की ठण्डी साँय-साँय थी, जिसे लपेटे बर्फ़ीली हवा बह रही थी। किंचित सिहरकर वाहिद ने खिड़की के पल्ले लगा दिए और अपने बज उठते दाँतों को एक-दूसरे पर जमाते हुए बोला, “कितनी सर्दी है! जिस्म बर्फ़ हुआ जा रहा है, चूल्हे में आग है क्या?”

प्रश्न पर सफ़िया ने आश्चर्य से वाहिद की ओर देखा। बोली नहीं। चुपचाप खाट पर लेटे वाहिद के पास आयी, बैठी और उसके कन्धे पर हाथ रखकर स्नेह-सिक्त स्वर में बोली, “मेरा बिस्तर गर्म है, वहाँ सो जाओ।”

वाहिद अपनी जगह लेटा रहा, कुछ बोला नहीं। थोड़ी देर के बाद उठकर पास ही पड़ी पोटली खींची, उसकी गाँठें खोलीं और काग़ज़ की पुड़िया रूमाल से अलग कर बोला, “शीरनी है, लो खाओ।”

“रहने दो…” सफ़िया बोली, “सुबह खा लूँगी। क्या मीलाद में बहुत लोग थे? किसके यहाँ थी?”

“वकील साहब के यहाँ। एक तो ग्यारहवें शरीफ़ की मीलादें और दूसरे इतनी सर्दी।”

वाहिद ने रजाई गर्दन तक खींच ली। अनायास भर उठने वाली झुरझुरी से एक बार सिहरकर अपना जिस्म समेटा और एक कोने में हो रहा। बन्द किवाड़ों को धक्का मारकर अन्धेरे और शीत में ठिठुरती हवा लौट गई और किवाड़ों की दराज़ में सिमटकर हवा दोशीज़ा की नटखट छुअन की तरह गर्म रजाई में भी वाहिद को छूकर कँपा गई।

पास वाले मकान से एक शोर उठ रहा था, एक बड़ी मीठी चहल-पहल, जिसमें पुरुष-स्त्रियों के स्वर और हँसी-मजाज़ के फ़व्वारे, देगों की उठा-पटक, बल्लियों और कफ़गीरों और कफ़गीरों के टकराने और झनझनाने की आवाज़ों के साथ घुले-मिले थे।

सफ़िया ने कहा, “मुनीर साहब के यहाँ कल सुबह दावत है।”

वाहिद ने सुन-भर लिया और आँखें बन्द कर लीं।

मुनीर साहब वाहिद के घर के पास ही रहते थे। आज से कोई छह साल पहले मुनीर साहब यहाँ मुनीम थे, पर बाद में उन्होंने नौकरी छोड़ दी और गल्ले का व्यापार शुरू कर दिया। क़िस्मत अच्छी थी, अतः दो साल के अन्दर ही उन्होंने हज़ारों रुपए कमाए और अपना पुराना माटी का कच्चा मकान तुड़वाकर पक्का और बड़ा मकान बनवाया।

उस दावत की चर्चा वाहिद पिछले कई दिनों से सफ़िया से सुन रहा था। मुनीर साहब की पत्नी ने, जो अक्सर वाहिद के यहाँ दोपहर में आ जाया करती थी, दो हफ़्ते पहले ही अपने यहाँ होने वाली दावत की घोषणा कर दी थी। जब कभी सफ़िया से भेंट हुई, थोड़ी इधर-उधर की चर्चा के पश्चात बात ग्यारहवीं शरीफ़ के महीने, मीलादों और दावतों पर पलट आयी और उसने बातों ही बातों में कई बार सुनाया कि उनके यहाँ की दावत में कितने मन का पुलाव, कितना ज़र्दा और कितने मन के बकरे कटने को हैं और इतने दिन पहले ही उनके रिश्तेदार चावल-दाल चुनने-बीनने और दूसरे कामों के लिए आ गए हैं। इस ज़रूरत से ज़्यादा इंतज़ाम करने के लिए उन्होंने सफ़ाई दी कि मीलाद, तीजा और किसी धार्मिक काम में चाहे लोग न आएँ, पर खाने की दावत हो तो एक बुलाओ, चार आएँगे। जब मामूली दावतों का यह हाल होता है तो यह तो आम दावत है।

सफ़िया को बुरा लगा हो, ऐसी बात नहीं, पर उसने कभी कुछ नहीं कहा।

वही दावत कल होने जा रही थी।

बड़ी देर से छा गई चुप्पी को सहसा तोड़कर बड़े निराश स्वर में सफ़िया बोली, “मुनीर साहब की बीवी के पाँव तो ज़मीन पर ही नहीं पड़ते। इतनी उम्र हो गई फिर भी ज़ेवरों से लदी पीली-उजली दुल्हन बनी फिरती हैं। भला बहू-बेटियों के सामने बुढ़ियों का सिंगार क्या अच्छा लगता है।”

वाहिद ने करवट बदली और एक लम्बी साँस लेकर कहा, “जिसे ख़ुदा ने इतना दिया है, वह क्यों न पहने? अपने-अपने नसीब हैं सफ़िया।”

सफ़िया को संतोष नहीं हुआ। थोड़ी देर चुप रहकर बड़े भरे हुए स्वर में बोली, “एक अपने नसीब हैं, ख़ुदा जाने तुम्हारे मुक़दमे का फ़ैसला माटी मिला कब होगा!” और सफ़िया के भीतर से बड़ी लम्बी और गहरी साँस निकली जो सीधे वाहिद के कलेजे में उतर गई।

वाहिद एक ढीला-ढाला, मँझोले क़द का आदमी था। ग़रीबी और अभाव से उसका परिचय बचपन से ही था। बड़ी आर्थिक कठिनाइयों के बीच आठवीं की शिक्षा प्राप्त कर सका था। आठवीं के बाद किसी तरह कोशिश कर-कराके उसे फ़ॉरेस्ट डिपार्टमेंट में फ़ॉरेस्ट गार्ड की नौकरी मिल गई और आठ साल के भीतर ही वह डिप्टी रेंजर तक पहुँच गया। जंगल महकमे वालों को भला किस चीज़ की कमी। चार साल के अन्दर ही वाहिद के नाम पोस्ट ऑफ़िस में डेढ़ हज़ार की रक़म जमा हो गई जिसमें से सात सौ उसके ब्याह में ख़र्च हुए। पर सफ़िया का भाग्य शायद अच्छा नहीं था। पूरे दो साल भी सुख से नहीं रह पायी थी कि वाहिद को रिश्वत के आरोप में मुअत्तल कर दिया गया। वाहिद ने बहुत हाथ-पाँव मारे। पोस्ट ऑफ़िस से तीन सौ और निकल गए। हेड क्लर्क की कई दावतें हुईं। रेंज ऑफ़िसर साहब (जिनके सर्किल में वाहिद आता था और जिन्होंने रिपोर्ट आगे बढ़ायी थी) के यहाँ उसने कई बार, मिठाई, फलों की टोकरियाँ और शहर के भारी भरकम आदमियों से ढेर सारी सिफ़ारिशें भिजवायीं और डी.एफ़.ओ. साहब की बीवी के पास (हालाँकि उसके पहले एक बार भी वहाँ जाने का अवसर नहीं आया था) सफ़िया को दो-तीन बार भेजा, पर कुछ नहीं हुआ। केस पुलिस को दे दिया गया और वाहिद पर मुक़दमा चलने लगा।

पहले कुछ महीने तो वाहिद को काफ़ी सान्त्वनाएँ मिलीं कि केस में कोई दम नहीं, ख़ारिज हो जाएगा। यहाँ वाले ज़्यादती और अन्याय करें पर ऊपर तो सबकी चिन्ता रखने वाला है और वाहिद के केस के साथ अकेले वाहिद का नहीं, दो और जनों का भाग्य जुड़ा है। अगर वाहिद दोषी भी है, तो वे लोग तो निर्दोष हैं इत्यादि।

जब एक साल का अर्सा बीत जाने पर मुक़दमा तय नहीं हुआ, पोस्ट ऑफ़िस से पूरे पैसे निकल गए और सफ़िया के जिस्म पर एक भी जेवर न रहा तो वाहिद की हिम्मत टूट गई और पहले जुम्मे के अलावा कभी भी मस्जिद की ओर रुख़ न करने वाला वाहिद अब पाँचों वक़्त नमाज़ पढ़ने लगा।

लगभग दो साल के बाद फ़ैसला हुआ और आशा के विपरीत, अच्छे से अच्छा वकील लगाने के बावजूद, वाहिद को साल भर की सजा हो गई।

वैसे तो अकस्मात टूट पड़ने वाली मुसीबत पहाड़ से कम न थी पर रिश्तेदारों और दोस्तों ने हाईकोर्ट में अपील करने का किसी-न-किसी तरह प्रबन्ध कर दिया और पूरे डेढ़ बरस से वाहिद हाईकोर्ट के फ़ैसले का इन्तज़ार कर रहा है, भले उस प्रतीक्षा में एक जून के खाने के बाद दूसरे जून की चिन्ता की हड़बड़ाहट, सफ़िया की शिकायतें, दिन-प्रतिदिन टूटता उसका स्वास्थ्य और उस दुर्दिन में माँ बनने की एहतियात, आवश्यक दवाई व देखभाल की सारी समस्याएँ शामिल थीं।

मुनीर साहब के यहाँ से देगों में भारी कफ़गीरों के फेरने-टकारने का स्वर गूँजा, बड़े ज़ोर से छन्न-छन्न की आवाज़ हुई और फिर घी में पड़े ढेर सारे मसालों की मीठी-सोंधी ख़ुशबू फैल गई।

घी अब वाहिद के लिए ख़्वाब है। जब तक लोअर कोर्ट से फ़ैसला नहीं हुआ था, ऑफ़िस से मुअत्तली का एलाउंस मिल जाया करता था, उसका ही सहारा कम न था। पर अब कहीं का कोई आसरा नहीं। इन कड़वे दिनों को वाहिद और सफ़िया मिलकर झेल भी लें, लेकिन उस मासूम जान का क्या होगा, जो वाहिद के दुर्दिन में ही सफ़िया के भाग्य में आने को थी? प्राइवेट फ़ण्ड की जो भी थोड़ी बहुत रक़म जमा थी और वापस मिलने को थी, उसके जाने के बहुत पहले से रास्ते तैयार थे, अतः उसका क्या भरोसा?

एक दिन झिझकती हुई सफ़िया बोली, “एक बात कहूँ?”

पल भर के लिए वाहिद डर सा गया, पता नहीं सफ़िया कौन-सी बात कहेगी? तुरन्त जवाब देते नहीं बना। क्षण भर उसकी तरफ़ देखता रहा, फिर पास जाकर अपनी हथेलियों में उसका चेहरा ले बड़ी उदास आँखों से देखने लगा, “क्या कहती हो?”

सफ़िया बोली, “प्राइवेट फ़ण्ड के पैसे मिलेंगे, तो घी ला दोगे? बहुत दिनों से अपने यहाँ पुलाव नहीं बना।”

वाहिद के भीतर जैसे किसी ने हाथ डालकर खँगाल दिया हो। अपने को किसी तरह पहले वह संयत कर धीरे से मुस्कराया, फिर ज़रा ज़ोर से बनायी हुई हँसी हँसता हुआ बोला, “बस?”

सफ़िया संकोच से लाल होकर मुस्कराती हुई वाहिद के सीने में छिप गई।

वहाँ से हटकर जब वाहिद दूसरे कमरे में आ गया तो निढाल-सा खाट में पड़ गया। भीतर से उफ़नती रुलाई का आवेग पलकों पर, ओठों पर बिछल रहा था। मुँह पोंछने के बहाने रुमाल से उसने आँखें पोंछीं और अपने लरज रहे ओंठ बाँहों में भींच लिए।

उस बात को भी तीन माह हो गए थे। सफ़िया ने एक-दो बार अप्रत्यक्ष रूप से पूछने की कोशिश की और चुप रह गई। उस रक़म की वाहिद को आज भी प्रतीक्षा है।

वाहिद ने करवट बदली। मुनीर साहब के यहाँ का शोर थम गया था और इक्की-दुक्की आवाज़ें आ रही थीं। सफ़िया थककर सो गई थी।

सर्दी की सुबह वाहिद के लिए आठ से पहले नहीं होती। पर उस दिन देर से सोने पर भी आँख सुबह जल्दी खुल गई। वैसे काम होने या न होने पर भी वह चाय आदि से निपटकर नौ से पहले ही बाहर निकल जाता है लेकिन उस दिन उसकी चाय दस बजे हुई।

बाहर मुनीर साहब के यहाँ भीड़ इकट्ठी हो रही थी साइकिल और पाँवों की रौंद से उभड़-उभड़कर धूल का बादल फैल-बिखर रहा था। और दिनों की तरह चाय देते हुए आज सफ़िया ने न तो राशन के समाप्त होने की बात कही और न पूछा कि आज वाहिद कहाँ से क्या प्रबन्ध करेगा। पिछली रात भी कुछ नहीं था। सुबह का बच रहा थोड़ा खाना वाहिद और सफ़िया ने मिलकर खा लिया था। रात की मीलाद की शीरनी नाश्ते का काम दे गई थी।

वाहिद ने पूछा, “क्यों, क्या मुनीर साहब के यहाँ से कोई आया था?”

सफ़िया ने थोड़ा झिझकते हुए जवाब दिया, “नहीं, हज्जाम आया था, आम दावत की ख़बर दे गया है।”

वाहिद ने और कुछ नहीं पूछा और बाहर निकल आया। मुनीर साहब के घर के सामने से लेकर दूसरे मोड़ तक लोगों का आना-जाना लगा था। रंगीन धारीदार तहमत लपेटे, सफ़ेद और काली टोपियाँ लगाए, सिर में रूमाल बाँधे लोग, मुनीर साहब के घर की ओर बढ़ रहे थे। एकाएक सामने से रिजवी साहब दिखायी दिए। वाहिद उनसे कतराना चाहता था पर जब सामने पड़ ही गए, तो बरबस मुस्कराकर आदाब करना ही पड़ा। रिजवी साहब के साथ नौ से लेकर तीन साल तक के चार बच्चे चल रहे थे, जिनके सिर पर आढ़ी-टेढ़ी, गन्दी और तेल में चीकट मुड़ी-मुड़ाई टोपियाँ थी।

रिजवी साहब ने मुस्कराकर पूछा, “क्यों भाई, मुनीर साहब के यहाँ से आए हो क्या?”

वाहिद ने झिझककर कहा, “जी नहीं।”

वाहिद से रिजवी साहब बोले, “तो फिर चलो न?”

वाहिद क्षण भर चुप रहा। फिर सम्भलकर बोला, “आप चलिए, मैं अभी आया।”

रिजवी साहब आगे बढ़ गए।

कोई दो घण्टों के बाद जब वहिद लौटा, तो मुनीर साहब के घर के सामने से भीड़ छँट गई थी, पर महफ़िल अभी भी चल रही थी। कोई पूछे या न पूछे, स्वागत करे या न करे, लोग आते, सामने के नल पर हाथ धोते और बैठ जाते थे।

एक ओर से कन्धे पर कपड़े से ढका तश्त लिए, चिंचोड़ी गई हड्डियों के गिर्द फैले ढेर सारे कुत्तों को हँकालती हमीदा की माँ निकली। हमीदा की माँ पिछले पाँच वर्षों से मुनीर साहब के यहाँ नौकर थी। अक्सर तीज-त्यौहारों के अवसर पर मुनीर साहब के यहाँ से शीरनी लेकर हमीदा की माँ वाहिद के यहाँ आया करती थी। उससे बात करने की न तो वाहिद को ही कभी आवश्यकता पड़ी और न अवसर ही आया। फिर भी वाहिद ने आज रोककर पूछा, “हमीदा की माँ, क्या लिए जा रही हो?”

हमीदा की माँ ने पल्लू सम्भालकर कहा, “खाना है भैया, सिटी साहब के यहाँ पहुँचाने जा रही हूँ।”

“भला वह क्यों?”

“अब पता नहीं, सिटी साहब आम दावत में आना पसन्द करें, न करें, सो बेगम साहबा भिजवा रही हैं।”

और हमीदा की माँ आगे बढ़ने लगी, तभी एकाएक चौंककर, (जैसे कोई महत्वपूर्ण और विशेष बात छूटी जा रही हो) ज़रा आवाज़ ऊँची करके, रोकने के अन्दाज़ में वाहिद ने पूछा, “और कहाँ-कहाँ ले जाना है हमीदा की माँ?”

हमीदा की माँ ने थोड़ा रुककर कहा, “पता नहीं भैया! फिर भी इतना जानती हूँ, अभी मेरी जान को छुटकारा नहीं।”

वाहिद ओठों में ही मुस्कराया और मुनीर साहब के घर की ओर बढ़ा। सामने आँगन में दो-तीन बड़ी-बड़ी दरियाँ (जो सम्भवतः हर दावत में पहुँच-पहुँचकर गन्दी हो चली थीं) बिछी हुई थीं, जिन पर साफ़, नये कपड़े पहने कुछ बच्चे खेल रहे थे। पास के नल से क्षण-प्रतिक्षण बह रहे पानी से आँगन के आधे हिस्से में कीचड़ फैल चुका था। पास ही दो-तीन चारपाइयाँ डाल दी गई थीं। चारपाइयाँ शायद उन उम्मीदवारों के बैठने के लिए जो देर से आने के कारण चल रही पाँत समाप्त होने और दूसरी पाँत के प्रारम्भ होने की प्रतीक्षा करते हैं। उन्ही लोगों में से क्या वाहिद भी है? वह बड़े फीके ढंग से मन-ही-मन हँसा। रस्सी भले ही जल गई हो, पर क्या उसका बल इतनी जल्दी निकल जाएगा।

थोड़ी देर वाहिद वहीं खड़ा रहा। वहाँ बैठने-बिठाने अथवा पूछने के लिए किसी की आवश्यकता नहीं थी। लोग आते थे, जाते थे।

भीतर के कमरे से जहाँ खाना चल रहा था, बर्तनों की टकराहट के साथ पुलाव की महक असाँसों के साथ वाहिद के फेंफड़ों में भर गई। मुँह भर आया, घूँट हलक के नीचे उतारकर वाहिद एक ओर खड़े दाँत खोदते, औक थूकते दो-तीन दाढ़ी वाले बुज़ुर्गों के पास जा खड़ा हुआ। दाँत के अँतरों में फँस गए गोश्त के टुकड़ों को तीली से निकाल फेंकने की जी तोड़ कोशिश करते हुए उन लोगों ने केवल वही सवाल किया, जिसका जवाब वाहिद पिछले डेढ़ बरस से प्रायः हर मिलने वाले को दिया करता था कि उसके केस का क्या हुआ, किस वकील को लगाया है, कितनी परेशानियाँ हो गई और अपील के फ़ैसले को कितनी देर है? आदि।

वाहिद ने सैकड़ों बार कही बात एक बार फिर अपने अनमने ढंग से दोहरा दी। तभी दरवाज़े के पास मुनीर साहब दिखायी दिए। इधर से ध्यान हटाकर वाहिद ने मुनीर साहब के चेहरे की तरफ़ अपनी आँखें जमा दी। पर लगातार कई मिनटों तक मुनीर साहब के चेहरे की तरफ़ देखते रहने पर भी उनका ध्यान वाहिद की तरफ़ नहीं लौटा और वह अपने किसी नौकर को हिदायतें देकर लौटने लगे, तो अपनी जगह से एकदम आगे आ, पुकारकर वाहिद ने कहा, “मुनीर साहब, आदाब अर्ज़ है।”

मुनीर साहब जाते-जाते पल भर को रुके, आदाब लिया, वाहिद की ओर देखकर मुस्कराए और तेज़ी से भीतर चले गए।

एकदम पीछे अपनी जगह को लौटने से पूर्व वाहिद ने सुना, पास के दाढ़ी वाले सज्जन उसका नाम लेकर पुकार रहे थे। लौटकर देखा तो उन्होंने कहा, “वाहिद मियाँ, पान लीजिए।”

एक कम उम्र का लड़का वाहिद के आगे पान की तश्तरी बढ़ाए खड़ा था। क्षण भर रुककर वाहिद ने अपने इर्द-गिर्द देखा, सामने खड़े लड़के पर एक निगाह डाली, तश्तरी से एक पान उठाकर मुँह में रखा और लौट रहे लोगों के पीछे हो लिया।

घर पहुँचकर देखा, सफ़िया तकिए में मुँह डाले चुपचाप पड़ी थी। बावर्चीख़ाने की ओर निगाह गई, चूल्हा लिपा-पुता साफ़ था और धुले-मँजे बर्तन चमक रहे थे। वाहिद को देखकर सफ़िया उठ बैठी और अपनी ओर घूरकर देख रहे वाहिद की आँखों में केवल निमिष-भर के लिए देखकर ठण्डे स्वर में पूछा, “कितने लोग थे दावत में? हमीदा की माँ तो आयी नहीं?”

वाहिद के जले पर जैसे किसी ने नमक छिड़क दिया हो। तिलमिलाकर तीखे स्वर में उसने कहा, “हमीदा की माँ की ऐसी की तैसी! मैं ऐसी दावतों में नहीं जाता, यह जानकर भी तुम ऐसे सवाल करती हो? हमने क्या पुलाव नहीं खाया? जिसने न देखा हो, वह सालों के यहाँ जाए!”

Book by Gulsher Khan Shani:

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शानी
गुलशेर ख़ाँ शानी (जन्म: 16 मई, 1933 - मृत्यु: 10 फ़रवरी, 1995) प्रसिद्ध कथाकार एवं साहित्य अकादमी की पत्रिका 'समकालीन भारतीय साहित्य' और 'साक्षात्कार' के संस्थापक-संपादक थे। 'नवभारत टाइम्स' में भी इन्होंने कुछ समय काम किया। अनेक भारतीय भाषाओं के अलावा रूसी, लिथुवानी, चेक और अंग्रेज़ी में इनकी रचनाएं अनूदित हुई। मध्य प्रदेश के शिखर सम्मान से अलंकृत और उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा पुरस्कृत हैं।