जीना चाहती हूँ

‘Jeena Chahti Hoon’, a poem by Pallavi Vinod

प्रेम के सबसे एकांत पलों में
जब मेरे तुम्हारे बीच किसी की भी गुंजाइश नहीं होती
मैं जीना चाहती हूँ अपने हिस्से का अनिर्वाच्य सुख,
हर बार उस गहन तिमिर में
मेरी आशाएँ प्रदीप्त हो उठती हैं
पतंगों-सा इन्हें भी नहीं ज्ञात अपने जीवित रहने की अवधि
सच ही कहा है किसी ने
जिजीविषा मृत नहीं होती।
नहीं ज्ञात कि तुम्हारे कोमल स्पर्श का अभिप्राय प्रेम है या कुछ और
पर मेरी धमनियों में बस प्रेम बहता है
रात्रि की नीरवता में तुम्हारी श्वास का आरोह-अवरोह
तुम्हारे हृदय का स्पंदन और मेरी धड़कनों का संगम
सब कुछ कितना लयबद्ध, कितना सुंदर
स्वप्न में भी ख़ुद को तुम्हारे आलिंगन में देख टूटती निद्रा पर
हर बार तुम्हारे कपोल चूमती हूँ
आख़िरी पहर की उस बेला को रोककर
अहर्निश के चक्र से मुक्त होना चाहती हूँ
जानती हूँ प्रभात की प्रथम किरणों के स्पर्श मात्र से
बदलती प्रकृति-सा तुम भी बदल जाओगे
ये जो है वो बस मिथ्या है छलावा है
पर मैं इस छलावे के सुख को इन अधरों से पीना चाहती हूँ
कुछ देर ही सही, तुम्हारे प्रेम में जीना चाहती हूँ।

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