मैं
इस हृदय विदारक समय में केवल
जीवन के बारे में सोचता हूँ
और उसे मेरी मृत्यु की चिन्ता लगी रहती है

जबकि मैंने कई बार कहा भी
क्या हुआ जो इस महानगर में ऑक्सीजन नहीं
क्या हुआ जो इस महानगर में श्मशान, शवों से अटे हैं
क्या हुआ जो इस महानगर में क़ब्रें मुर्दों से छोटी पड़ रहीं

और जिनको ज़िन्दा रखना था अपना ईमान
वो तो कब के मर चुके हैं

करुणा बिन शब्दों के सारे अनुप्रास झूठे हैं
देखो! तुममें बची है अभी करुणा
जो मृत्यु के बारे में सोचते हुए भी कर रही हो
जीवन के लिए प्रार्थना

सृष्टि करुणा से बनी है
और तुम्हारी आँख में करुणा का जल शेष है अभी

अच्छा सुनो!
काल की बेला में तीजे के लिए कौन आएगा भला
और तब तो बिल्कुल नहीं
जब जीवन एक अन्तहीन विलाप में डूबा जा रहा हो

और
एक कवि का बारहवाँ तो बिल्कुल भी अच्छा नहीं
उसने किया तो
उसका किया भी तो
सारी की सारी कविताएँ झूठी पड़ जाएँगी

वो!
इन्हीं दिनों राशन की दुकान पर उदास-मन
अन्न का इन्तज़ार करते नहीं थकती
लेकिन महानगरों में शव-जलाई की बारी के
इन्तज़ार की ख़बरें थका देती हैं उसे

वो! इन दिनों
केवल और केवल मृत्यु के बारे में सोचती है
और मैं उसे हर बार जीवन के बारे में बताता हूँ

मैंने
एक दिन फिर से कहा
कि मृत्यु के बारे में इतना सोचोगी तो
क्या पता सचमुच मर ही जाऊँ

बस!
उसी दिन से मृत्यु के बारे में सोचते हुए
जीवन की बात करने लगी

और मैं
न जाने क्यूँ
उससे जीवन की बात करते हुए
मृत्यु के बारे में सोचने लगा

जबकि अभी
मेरे इर्द-गिर्द कोई है जो मृत्यु के बारे में सोचते हुए
कर रहा है जीवन की बात /
प्रार्थना।

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ओम नागर
जन्म- 20 नवम्बर 1980, अंताना, तहसील-अटरू, जिला-बारां, राजस्थान | राजस्थान साहित्य अकादमी के सुमनेश जोशी पुरस्कार से सम्मानित, केन्द्रीय साहित्य अकादमी के युवा पुरस्कार से सम्मानित, ज्ञानपीठ नवलेखन पुरस्कार से सम्मानित | कविता संग्रह- देगना एक दिन, विज्ञप्ति भर बारिश; डायरी- निब के चीरे से, तुरपाई; कविताओं को मराठी, अंग्रेजी सहित कई भाषाओं में अनुवाद।