जो तकब्बुर से भटकती है ज़बाँ

जो तकब्बुर से भटकती है ज़बाँ
आगे-आगे फिर बहकती है ज़बाँ

हो गया नासूर हर इक लफ़्ज़ है
बोलता हूँ पकने लगती है ज़बाँ

जिल्द से छन-छन के बहते हैं ख़याल
और आँखों से छलकती है ज़बाँ

नाम-ए-जाँ कितना गराँ है जान पे
हल्क़ गलता है, पिघलती है ज़बाँ

मोजिज़ा है ये भी उसके क़ौल का
बूँद बनकर जो बरसती है ज़बाँ

कुछ मुलाक़ातों में ही है ये असर
तुझ में भी मेरी झलकती है ज़बाँ

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