पहले उसने कहा—
भई! मैं
कविताएँ सुन-सुनकर बड़ा हुआ हूँ

हमारे लड़ दादा कवि थे
हमारे पड़ दादा कवि थे
हमारे दादा महाकवि थे
पिता जी अनेकों पुरस्कारों से नवाज़े गए थे
मुझे भी इस बरस फ़लाना पुरस्कार मिला है

यह सब कहकर जब वह
कविता सुना रहा था
तो मैंने
झुँझलाकर कहा—
इन पुरस्कारों की भूंकळी कर लें

और सुनो
खेतिहरों के लिए भाता ले जा रहीं भतवारणें
जब गा रही होती हैं बीच राह
दुःख के दिनों में सुख के गीत
तब उन गीतों के आगे
जुहार करती हुईं
तुम लोगों की पावली कविताएँ पानी भरती हैं

अब आप जाइए
हण्डिया से छलकती छाछ के गीत सुनने दें!

Book by Sandeep Nirbhay:

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संदीप निर्भय
गाँव- पूनरासर, बीकानेर (राजस्थान) | प्रकाशन- हम लोग (राजस्थान पत्रिका), कादम्बिनी, हस्ताक्षर वेब पत्रिका, राष्ट्रीय मयूर, अमर उजाला, भारत मंथन, प्रभात केसरी, लीलटांस, राजस्थली, बीणजारो, दैनिक युगपक्ष आदि पत्र-पत्रिकाओं में हिन्दी व राजस्थानी कविताएँ प्रकाशित। हाल ही में बोधि प्रकाशन जयपुर से 'धोरे पर खड़ी साँवली लड़की' कविता संग्रह आया है।

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