जुमलों की डकार

बातों और जुमलों का भोजन करो तो कई दिनों तक डकार आती है।

मियां – “क्या बात है भई मशगूल, आज बड़ी डकार आ रही है तुम्हें। ज़्यादा खा लिए क्या?”

मशगूल – “हाँ मियां आज थोड़ा ज़्यादा हो गया।”

मियां – “क्या खा लिए सुबह-सुबह?”

मशगूल – “आज नाश्ते में 10-20 जुमले निगल गया हूँ, शाम को कहीं उगलूँगा।”

मियां – “जुमला? भला ये भी कोई खाने की चीज़ है?”

मशगूल – “लो मियां कर दी ना आपने समझदारों वाली बात, भई दाल-चावल तो गरीब और बेचारे लोग खाते हैं, महान व्यक्ति जुमले ही खाता है और उसी की डकार भी लेता है।”

मियां – “भई मैंने तो कभी नहीं खाया।”

मशगूल – “तभी तो आपको कोई जानता भी नहीं मेरे अलावा और मैं भी इसीलिए आपसे बात करता हूँ कि कभी-कभी आप भी मेरे ये बेफिज़ूल बेशकीमती जुमले सुन लेते हो, जब मन करता है आपके सामने आकर उगल देता हूँ।”

मियां – “क्या तुम्हारा बहुत नाम है शहर में?”

मशगूल – “अब लो फिर आपने वही नादानों वाली बात कर दी, एक बार शहर में घूमिए और देखिए मेरे नाम की चर्चा हर चौराहे पर है कि मैं कितना फेकू हूँ और हमेशा जुमलेबाज़ी में लगा रहता हूँ। यह सुनकर मेरा सीना गर्व से फट ही पड़ता है।”

मियां – “ये तो बड़े कमाल की बात है, तुम्हारी ऐसी फ़र्ज़ी बातें लोग सुनते भी हैं।”

मशगूल – “लो जी, सुनने की बात कर रहे हैं, तालियां पीटते हैं तालियां। इतना ही नहीं मेरे भक्त बन जाते हैं मेरी ये बकवास सुनकर।”

मियां – “अच्छा, कभी मुझे भी खिलाओ ये जुमला, देखें इसका स्वाद कैसा होता है।”

मशगूल – “कभी भी आइए, मैं सुबह का नाश्ता, लंच, डिनर सबमें जुमला ही खाता हूँ, इसीलिए तो इतना चुस्त-दुरुस्त रहता हूँ। आप भी सुबह नास्ते में 4-6 जुमले चबाया करिए और शाम होते होते कहीं जाकर उगल दिया करिए देखिए आपकी पाचन शक्ति कैसे बढ़ जाती है।”

मियां – “अच्छा!”

मशगूल – “हाँ, और एक बार पाचन शक्ति बढ़ी फिर तो दे जुमले पे जुमला खींचते रहिए और लोगों के सामने उगलते रहिए। अच्छा तो अब मैं चलता हूँ, उगलने का टाइम हो गया है। समय से नहीं गया तो मेरा दिमाग फट जाएगा।”

मियां – “अच्छा भैया नमस्कार!”