काम करेगी उसकी धार
बाक़ी लोहा है बेकार

कैसे बच सकता था मैं
पीछे ठग थे, आगे यार

बोरी-भर मेहनत पीसूँ
निकले इक मुट्ठी-भर सार

भूखे को पकवान लगें
चटनी, रोटी, प्याज, अचार

जीवन है इक ऐसी डोर
गाँठें जिसमें कई हज़ार

सारे तुग़लक चुन-चुनकर
हमने बनायी है सरकार

शुक्र है राजा मान गया
दो दूनी होते हैं चार

प्यार वो शै है हस्ती जी
जिसके चेहरे कई हज़ार!

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Book by Hastimal Hasti:

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