काश

‘Kaash’, a poem by Amandeep Gujral

तुमने कहा मान लो
मान लिया मैंने
तुमने कहा मत बोलो
चुप रही मैं
तुमने कहा खाना साथ खाएँगे
आधी-आधी रात तक राह तकी मैंने
तुमने मुझे
कपड़ों, बालों, जूतों और न जाने
किस किस बात के लिए कहा
हर बात सुनी मैंने
काश जीने के लिए भी कहा होता
बिना किसी शर्त…
जी लेती मैं।

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