कहीं नहीं जाते

‘Kahin Nahi Jaate’, a poem by Amandeep Gujral

जो चले जाते हैं
दरअसल वो कहीं नहीं जाते
ठहरे रहते हैं आसपास
तैरते रहते हैं पानी की बूँदों-से हवा में
उग आते हैं इन्द्रधनुष बन।

जो चले जाते हैं
वो कहीं नहीं जाते
सितारे बन टँक जाते हैं
आसमान पर
हर रात उग आते हैं ध्रुव तारा बन।

जो चले जाते हैं वो कहीं नहीं जाते
पीछा करते हैं लगातार
कभी रसोईघर में
कभी सोफ़े पर
या कभी सीढ़ियों से उतरते चढ़ते।

जो चले जाते हैं
वो कहीं नहीं जाते
धूप बन पसरे रहते हैं आँगन में
पैरों के साथ अन्दर आ बैठ जाते हैं यूँ ही किसी कोने में
कहते हैं कहा था न मैंने अभी नहीं समझेगी
जब हम नहीं रहेंगे याद करना तब।

हवा बन फुसफुसा जाते हैं कानों में
बढ़ती घटती धड़कनों के साथ धड़कते हैं कभी
फिर पास आ बिस्तर पर आज भी सुनाते हैं लोरियाँ
बचा रह जाता है कुछ सच, कुछ झूठ
कुछ उलाहने
या कुछ प्यार भरी झप्पियाँ।

जो चले जाते हैं
वो कहीं नहीं जाते।