‘Kako Ke Premi’, a story by Balwant Singh

काको की उम्र अढ़ाई-तीन वर्ष की होगी। बड़ी प्यारी बच्ची थी। उसकी आंखों में तारे आंख-मिचौली खेलते थे, उसका चेहरा पिघले हुए चांद की तरह था, उसके होंठों पर बीरबहूटियां दमकती थीं, गाल ऐसे दिखाई देते थे, जैसे उदय होते हुए सूर्य ने बादलों पर गुलाबी रंग बिखेर दिया हो और बाल जैसे वर्षा ऋतु में नमदार कोयला। इधर चाचा को काका और चाची को काकी कहते हैं… लेकिन पंजाब में बच्चे को काका और बच्ची को काकी कहते हैं, अगर बहुत लाडली हुई, तो काको भी कहते हैं। यह स्पष्ट है कि काको उसका असली नाम नहीं था। उसका असली नाम… लेकिन नाम में क्या रखा है?… सभी ख़ूबसूरत बच्चे एक ही से प्यारे लगते हैं।

वह एक सिक्ख किसान दर्शनसिंह की लड़की थी। जब वह पैदा हुई, तो दर्शनसिंह ज़रा ख़ुश न हुआ, बल्कि लड़की पैदा होने की ख़बर सुनकर उसने यूं सिर नीचे डाल दिया, जैसे अब लोग उसके मर्द होने में शक करने लगेंगे! मगर जब काको ज़रा बड़ी हुई, तो सब लोग बाप से कहते कि तुम बड़े भाग्यवान् हो, जो ऐसी प्यारी बच्ची पायी। तब दर्शनसिंह को भी वह प्यारी लगने लगी और अकसर वह उसे गोद में उठाकर उस समय तक प्यार किया करता, जब तक कि उसे याद न आता कि काको तो लड़की थी।

लेकिन दूसरे सभी लोग काको को बहुत प्यार करते थे, क्योंकि उनमें से किसी को इस बात की फ़िक्र नहीं थी कि काको जब बड़ी होगी, तो अपने बूढ़े माता-पिता का सहारा बनने की बजाय पराये घर को चली जायेगी और अपने साथ बाप की पूंजी का बहुत बड़ा भाग भी लेती जायेगी।

काको बड़ी हंसमुख बच्ची थी। जीवन की कड़वाहट का उसे कुछ पता नहीं था। वह अपने साधारण वातावरण में यूं चहकती फिरती, जैसे बड़े अचम्भे के मेले में आ गयी हो। सुबह के समय वह अपने बाप के कन्धे पर या मां की गोद में सवार होकर गुरुद्वारे जाती। वहां लम्बी-लम्बी दाढ़ी वाला ग्रन्थी न जाने एक मोटी-सी पुस्तक में से क्या पढ़ा करता था। वह गाकर नहीं पढ़ता था, लेकिन फिर भी उसकी आवाज़ में संगीत और एक अजीब क़िस्म की खनखनाहट होती थी, जिसे वह चुपचाप सुना करती। वहां पर उसे जो बात सबसे अच्छी लगती थी, वह यह थी कि पाठ के अन्त में उसे बहुत-सा हलुआ (प्रसाद) मिलता था। वह अपने बाप और मां के हलुए में से भी हिस्सा बांट लेती, यहां तक कि गुरुद्वारे के बाहर बैठी गूंगी (लेकिन बहरी नहीं) माई सेवां भी अपने हलुए में से थोड़ा-सा चखकर बाक़ी काको को दे देती। हर सुबह इतना हलुआ उसके नाश्ते का काम देता था।

वह सारा-सारा दिन इधर-उधर घूमा करती। गांव के करीबवाले रहट का पानी बल खाता, कुलबिलाता, झाग उड़ाता, किनारे-किनारे उगी हुई हरी-हरी दूब से उलझता हुआ पीपल के बड़े पेड़ की जड़ के निकट से होकर बहता चला जाता। पीपल की छांव-तले नमदार दूब में छिपे, नाक तक पानी में डूबे पीले-पीले मेंढकों की उसे तलाश रहती। अकसर मेंढक उसे पहले ही देख लेते और उसकी नीयत भांपकर उछलते और गड़ाप से पानी में डुबकी लगा जाते, तो काको पहले डरकर चौंकती और फिर खिलखिलाकर हंस पड़ती और उसकी हंसी का संगीत पानी की छनछनाती सरसराहट में घुल-मिल जाता।

खेतों में झड़बेरियों के अलावा मीठी लसूड़ियों के पेड़ भी होते थे। वह दूसरे बच्चों के साथ वहां जाती, झड़बेरियों के बेरों के साथ कांटों का मज़ा भी चखती। मारे दर्द के सी-सी करती, फिर भी बेर खाये जाती। लसूड़ियों का तो भला कहना ही क्या? हां, कभी-कभार किसी लसूड़ी की गुठली मुंह से फिसलकर हलक में से उतरती हुई नीचे पहुंच जाती।

इस काम से फुर्सत पाकर वह सब बच्चे मदार के पौधे के पास जाकर खड़े होते और उन पर लगे हुए आमों की तरह के फल तोड़-तोड़कर झोलियों में भर लेते, जो दरअसल उनके किसी काम में न आ सकते थे। फिर एकाएक किसी बड़े से मोटे पत्ते पर बैठा हुआ लम्बी टांगों वाला, हरे रंग का टिड्डा उन्हें घूरता दिखाई देता और वह ठिठककर हाथ रोक लेते, जैसे वह टिड्डा चौकीदार हो, जो उन्हें फल तोड़ने पर फटकारने लगेगा। टिड्डा भी उन्हें ऐसी गम्भीरता से घूरे जाता, जैसे उसने सभी वेद और पुराण घोटकर पी रखे हों।

जब वह मिट्टी की कच्ची ईंटों की बनी हुई दीवारों की ठण्डी छांव-तले खेलती होती, तो उस गली में से गुज़रने वाला शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति होता, जो काको को देखकर रुक न जाता। यूं तो सभी उसे प्यार करते थे, लेकिन इसमें तीन बुड्ढे तो उसे हद से ज़्यादा चाहते थे — यानी फग्गासिंह, बग्गासिंह और झण्डासिंह। इनमें सब से छोटा सत्तर वर्ष का और बाक़ी दो अस्सी से एक-आध साल ही कम। इन तीनों बुड्ढों की आपस में या काको से कोई रिश्तेदारी नहीं थी। वे पासवाले अलग-अलग गांव में रहते थे। उनमें से एक डाके मारता था, दूसरा जुआ खेलता था, तीसरा नशेबाज़ी की चीजें — जैसे अफ़ीम, भंग, चरस आदि एक सूबे से दूसरे सूबे में पहुंचाता था। उनकी दाढ़ियां बहुत घनी, बहुत लम्बी और क़रीब-क़रीब बहुत सफ़ेद थीं। सिर पर लम्बे-लम्बे पग्गड़ बांधते थे, जैसे पूरा थान लपेट रखा हो; गले में खद्दर के कुरते के नीचे नीले, हरे या तूतिया रंग के तहबन्द।

कहने को बुड्ढे थे, लेकिन देखने में ख़ूब लम्बे-चौड़े, बड़े-बड़े हाथ, मज़बूत बाज़ू, लाल-लाल चमकती हुई आंखें, जिन पर सफ़ेद भवों की छत्र-छाया। उन तीनों का अपना न आगा, न पीछा। जो कोई आता, काको के लिए खिलौने, मिठाइयां और कपड़े लाता। काको इसमें से किसी को भी देखती, तो दूर ही से चिल्ला उठती, “बापू!”

वह अपने नन्हे-नन्हे बाज़ू फैलाये तेज़ी से दौड़ पड़ती और उछलकर गले में बांहें डाल देती और वे बुड्ढे उससे मिलकर बहुत ख़ुश होते — इतने ख़ुश होते, इतने ख़ुश होते कि उनकी आंखें नमदार हो जातीं। अकसर एक-न-एक बुड्ढा आता रहता था। ऐसा भी होता कि काको एक बुड्ढे की गोद में चढ़कर गलियों की सैर के बाद लौटती, तो घर पर दूसरा बुड्ढा इन्तज़ार में बैठा होता। कभी-कभी वे तीनों एक साथ ही आ टपकते। उस दिन काको की ख़ुशी का ठिकाना न रहता; क्योंकि ऐसे मौक़ों पर उसे ज़्यादा-से-ज़्यादा तोहफ़े और मिठाइयां मिलती थीं।

2

एक शाम जबकि अंधेरे की स्याही काफ़ी गहरी हो चुकी थी, फग्गासिंह काको के घर आया। ऐसे मौकों पर काको अकसर ड्योढ़ी में अपने बाप के साथ मैना की तरह चहकती-बोलती मिलती थी या सहन से उसकी रूपहली आवाज़ में नन्हे-नन्हे क़हक़हे सुनाई दिया करते थे। लेकिन आज उसका कहीं पता नहीं था। दर्शनसिंह हल में फांस ठीक कर रहा था। फग्गासिंह खाट पर बैठते हुए बोला, “काको कहां है?”

दर्शनसिंह ने सिर ऊपर उठाये बगैर उत्तर दिया, “वह बीमार है… उसे रेशा (ज़ुकाम) हो गया है।”

“रेशा?” फग्गासिंह के मुंह से निकला।

दर्शनसिंह कुछ नहीं बोला, तो फग्गासिंह उठकर सहन में पहुंचा। काको भीतरवाले छोटे कमरे में अपनी रंगदार पायोंवाली नन्ही-सी चारपाई पर लेटी हुई थी। सरसों के चिराग़ की फड़फड़ाती रोशनी में वह बिल्कुल मोम की मूर्ति दिखाई देती थी। उसका चेहरा लाल हो रहा था। आंखें बन्द थीं, नाक भी बन्द थी, आज उसकी नाक की नोक भी उसके होंठों की तरह सुर्ख लाल हो रही थी और वह सांस भी मुंह से ले रही थी। उसके कलियों के-से होठों में दांत धीमे-धीमे चमक रहे थे। फग्गासिंह ने अपना बहुत बड़ा हाथ उसके माथे पर रख दिया और फिर भारी आवाज़ में काको की मां से पूछा, “बेटी, काको कै दिन से बीमार है?”

मां कमरे के बाहर पसार में बैठी रोटी पका रही थी। घूंघट की आड़ में से बोली, “कल सुबह से।”

“कोई दवा-दारू?”

“हकीमजी का काढ़ा पिला रहे हैं।”

फग्गासिंह ने कुछ देर सोचा और फिर कमर में ठुसे हुए तहबन्द के पल्लू को खींचकर उसमें से अफ़ीम की डिबिया निकाली — वह खुद बिना नागा अफ़ीम खाया करता था — और फिर चुटकी में थोड़ी-सी अफ़ीम ले चुपके से काको के अधखुले मुंह में सरका दी और बड़े इत्मीनान से बोला, “कोई बात नहीं, सुबह तक ठीक हो जायेगी।” यह कहकर वह झुका और उसने काको के छोटे-से माथे को चूमा और फिर भारी क़दमों से लौटा।

वह जानता था कि अफ़ीम रेशे के बहते हुए पानी को सुखा देती है और ज़ुकाम दुम दबाकर भाग जाता है। उसने अपनी दवाई का ज़िक्र किसी से नहीं किया। वह इसी में मगन था कि सुबह को जब काको एकदम ठीक-ठाक हो जायेगी, तो सब लोग कितने ख़ुश होंगे!

उसके जाने के कुछ देर बाद बग्गासिंह कहीं से आ निकला। उसे जब पता लगा कि काको बीमार पड़ी है, तो वह बेचैन हो गया। अपने तहबन्द को फड़फड़ाता हुआ वह काको की खाट के पास पहुंचा। घड़ी-भर उसे नमदार आंखों से देखता रहा। आख़िर जब उसने बीमारी को समझ लिया, तो उसने अपनी अफ़ीम की डिबिया निकाली और इतनी-सी ख़ुराक, जो बच्चे के लिए उचित समझी जाती है, डिबिया में से निकालकर प्यारी काको के प्यारे से मुंह में लुढ़का दी। उसने भी यह काम चुपके-से किया, क्योंकि वह जानता था कि काको के मां-बाप दवा-दारू के मामले में बिल्कुल गधे थे, शायद अफ़ीम खिलाने पर एतराज़ करें। अब वह भी इत्मीनान के साथ विदा हुआ।

झण्डासिंह को भी उड़ती-उड़ती ख़बर मिली कि उसकी लाडली काको बीमार है। घर के लोग सोने जा रहे थे कि उसने दरवाज़ा आन खटखटाया और फिर बोला, “भई दर्शनसिंह, मुआफ़ करना, काको की बीमारी का हाल सुनकर मुझसे रहा नहीं गया, इसलिए भागा चला आया।”

फिर वह काको की खाट के एक किनारे पर बैठ गया। जब उसे पता चला कि काको को केवल रेशा है, तो उसने भी ऐलान किया कि यह तो मामूली बात है। इत्तफ़ाक से वह भी दूसरे बुड्ढों की तरह चुनिया बेगम, यानी अफ़ीम का प्रेमी था और इसे रेशे की रामबाण दवा समझता था। चुनांचे उसने भी सबकी आंख बचाकर बच्चे के लिए उचित खुराक निकाली और काको के मुंह में सरका दी। जाते-जाते काको की मां से कहने लगा, “मैं तो डर गया था कि कहीं कोई खास बीमारी न हो। रेशे से घबराने की कोई बात नहीं… सुबह तक ठीक हो जायेगी।”

इसके बाद ‘वाहे गुरुजी का खालसा’ और ‘वाह गुरुजी की फ़तह’ का नारा लगाकर वह ख़ुश-ख़ुश ड्योढ़ी के दरवाज़े से बाहर निकल गया।

3

जब सूर्य देवता ने प्रकाश का पहला भाला फेंका, तो सुबह का तारा मारे डर के दूर ही से भाग निकला और आंखों से ओझल हो गया। आकाश की नीलाहट हलकी होती चली गयी। बड़े पीपल के पत्ते तालियां बजाने लगे। हलके नीले आसमान में एक सफ़ेद कबूतर यूं चकफेरियां ले रहा था, जैसे चांदी के वर्क में जान पड़ गयी हो। कौवों की कांव-कांव के शोर में किसान हल लेकर खेतों में जा पहुंचे, रहटों की रू-रू वातावरण में गूंजी और सोये हुए खेत जाग उठे। इन सब चीजों को देख-देखकर तालियां बजाने और क़हक़हे लगाने वाली काको उस समय मर चुकी थी।

दर्शनसिंह को पहले तो यक़ीन ही नहीं आया। लेकिन जब उसे पता चला कि काको वाक़ई ऐसी मरी है कि लौटकर नहीं आयेगी, तो वह फूट-फूटकर रोने लगा और कहने लगा, “नहीं-नहीं! मैं अपनी लाडली को नदी में नहीं बहाऊंगा! छोटी थी, तो क्या हुआ, मैं तो उसे बाक़ायदा चिता में जलाऊंगा और फिर उसके फूल हरिद्वार जाकर गंगाजी में बहा दूंगा।”

4

उस सुबह काको गुरुद्वारे के हलुए का नाश्ता करने नहीं गयी। गूंगी माई सेवां बहुत देर तक कड़ाह प्रसाद (हलुआ) हाथों में दबाये काको का इन्तज़ार करती रही। कहीं दोपहर तक किसी ने बताया कि बेचारी नन्ही काको तो वाहेगुरु अकाल पुर्ख के चरणों में पहुंच चुकी है।

माई सेवां न जाने कब और कहां से उस गुरुद्वारे में आयी थी। उसका दुनिया में कोई न था, इसलिए कई वर्ष से माई सेवां उस गुरुद्वारे की सेवा कर रही थी। गुरुद्वारे के बाहर एक छोटा-सा बाग़ था, गुरुद्वारे का अपना रहट भी था। माई सेवां न केवल गुरुद्वारे के अन्दर झाड़ू लगाती, हर क़िस्म का छोटा-बड़ा काम करती थी, बल्कि उस बाग़ की देखभाल भी करती थी। काको के बारे में ख़बर सुनकर उसका मन उचाट हो गया, किसी काम में मन नहीं लगा, यहां तक कि अंधेरा छाने लगा।

आज किसी त्योहार के कारण गुरुद्वारे के सहन में संगत जमा होने लगी थी। माई सेवां जूतों की रखवाली के लिए दरवाज़े के चबूतरे पर बैठ गयी। संगत के लोग दालान में ही पुरानी दरियों पर जा-जा के बैठ रहे थे। गरमी जा चुकी थी और गुलाबी जाड़ा पड़ने लगा था। लोग मोटे-मोटे खेस या खद्दर की भारी चादरें लपेटे हुए थे। एक ग्रन्थी कन्धों पर पीताम्बर डाले श्री गुरुग्रन्थ में से गुरु की वाणी पढ़ रहा था। इतने में फग्गासिंह वहां आया। वह बड़ा उदास था। उसने देखा कि माई सेवां भी उदास है। कारण तो एक ही था। वह घड़ी-भर के लिए चबूतरे पर बैठकर काको का अफ़सोस करने लगा। उसने अफ़ीम देने की बात भी बतायी, जिसे वह रामबाण समझता था, लेकिन न जाने क्यों ऐसी आज़मायी हुई दवा ने भी कुछ असर नहीं किया। फिर उसने माथे पर हाथ मारकर भर्रायी हुई आवाज़ में कहा, “मुझे पता होता कि इतनी ख़ुराक कम रहेगी, तो मैं उसे ज़्यादा दे देता।”

इसके बाद फग्गासिंह घुटनों पर हाथ रखकर मुश्किल से उठा और आंसू पोंछता हुआ अन्दर चला गया।

फिर बग्गासिंह आया। उसने भी वही बात सुनायी और फिर अफ़ीमवाली बात बतलायी। जब वह रोता हुआ दालान में जाकर बैठ गया, तो झण्डासिंह भी आ निकला और वह भी दु:ख बांटने के लिए माई सेवां के पास दो घड़ी को बैठ गया। जब माई सेवां अकेली रह गयी, तो वह सिर उठाकर आकाश की ओर देखने लगी। अब उसे पता चल गया कि काको को चाहने वाले इन बुड्ढों ने कितनी हमदर्दी और कितने गहरे प्यार से अपने हाथों अपनी प्यारी काको की जान ले ली थी …अब तीनों को अपने मन में इस बात का पछतावा था कि काश वे काको को ज़रा ज़्यादा मिक़दार में अफ़ीम खिला देते, तो उसकी जान बच जाती।

माई सेवां बाग़ की ओर देखने लगी, जहां दिन के उजाले में रंग-बिरंगे फूल सिर मटकाते थे और भांति-भांति की चिड़ियां चहचहाती थीं। लेकिन उस समय यूं लगता था, जैसे वहां भूत अफ़ीम खाये सोये पड़े हों। वह सोचने लगी कि न जाने कितने प्यारे, कितने ख़ूबसूरत और उस काको की तरह के कितने मनमोहक ख़याल इसी प्यार और हमदर्दी के साथ कुचल दिये जाते हैं, उस काको की तरह अनगिनत विचार और भावनाएं ऐसी होती हैं, जो मनुष्य की अक़लमन्दी और चतुराई का बोझ भी सहन नहीं कर सकतीं, बल्कि वह रंगीन तितलियों की तरह चतुराई की दहकती हुई लू में जलकर मर जाती हैं।

माई सेवां ने दालान की ओर देखा, जिसके परले कोने पर बैलगाड़ी का एक पुराना पहिया दीवार के साथ टिका हुआ था। उसके पास ही गोबर और बकरियों की मेंगनियों की बदबू उठ रही थी और दालान के इस तरफ़ चमेली के फूल महक रहे थे, ग्रन्थीजी की भक्ति-रस में डूबी हुई आवाज़, वातावरण में गूंज रही थी… और वे बूढ़े अब भी अंगोछे से आंसू पोंछे जा रहे थे। माई सेवां को यूं लगा कि आकाश के उज्ज्वल तारे जैसे अनगिनत सफ़ेद फूल हों, जिनकी किसी अनजानी शक्ति ने धरती पर बारिश कर दी हो। लेकिन वे तारे — वे फूल न जाने क्यों रास्ते में ही रुक गये थे… अब वे न पीछे जा सकते थे और न इस धरती पर गिरना चाहते थे।

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बलवंत सिंह
बलवंत सिंह (जन्म: जून 1921ई. - 27 मई 1986ई.) - बीसवीं सदी की उर्दू और हिन्दी के मशहूर नाटककार, उपन्यासकार और गल्पकार और पत्रकार।

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