‘कलम का सिपाही’ प्रेमचन्द की पहली मुकम्मल जीवनी है जो जीवनी साहित्य में क्लासिक का दर्जा पा चुकी है। अमृतराय की लिखी इस किताब को 1963 में साहित्य अकादेमी पुरस्कार और 1971 में सोवियतलैंड नेहरु पुरस्कार मिला। अब यह जीवनी आलोक राय जी की भूमिका के साथ प्रकाशित हो रही है। प्रस्तुत है किताब का अंश, साभार हंस प्रकाशन और राजकमल प्रकाशन

दक्षिण के एक हिन्दी प्रेमी, चन्द्रहासन, प्रेमचन्द से मिलने काशी आए। पता लगाकर शाम के वक़्त उनके मकान पर पहुँचे। बाहर थोड़ी देर ठहरकर खाँ-खूँ करने पर भी कोई नज़र न आया तो दरवाज़े पर आए और झाँककर भीतर कमरे में देखा। एक आदमी, जिसका चेहरा बड़ी-बड़ी मूँछों में खोया हुआ-सा था, फ़र्श पर बैठकर तन्मय भाव से कुछ लिख रहा था। आगंतुक ने सोचा, प्रेमचन्द जी शायद इसी आदमी को बोलकर लिखाते होंगे। आगे बढ़कर कहा—मैं प्रेमचन्द जी से मिलना चाहता हूँ। उस आदमी ने झट नज़र उठाकर ताज्जुब से आगंतुक की ओर देखा, क़लम रख दी, और ठहाका लगाकर हँसते हुए कहा—खड़े-खड़े मुलाक़ात करेंगे क्या! बैठिए और मुलाक़ात कीजिए…

बस्ती के ताराशंकर ‘नाशाद’ मुंशीजी से मिलने लखनऊ पहुँचे। उन दिनों वह अमीनुद्दौला पार्क के सामने एक मकान में रहते थे। मकान के नीचे ही ‘नाशाद’ साहब को एक आदमी मिला, धोती-बनियान पहने। ‘नाशाद’ ने उससे पूछा—मुंशी प्रेमचन्द कहाँ रहते हैं, आप बतला सकते हैं? उस आदमी ने कहा—चलिए, मैं आपको उनसे मिला दूँ।

वह आदमी आगे-आगे चला, ‘नाशाद’ पीछे-पीछे। ऊपर पहुँचकर उस आदमी ने ‘नाशाद’ को बैठने के लिए कहा और अन्दर चला गया। ज़रा देर बाद कुर्ता पहनकर निकला और बोला—अब आप प्रेमचन्द से बात कर रहे हैं…

पटने में एक साहित्यिक गोष्ठी है। मुंशीजी को उसका सभापति बनाया गया है। आज वह पटना आने वाले हैं। बहुत से लोग उनके स्वागत को स्टेशन पर पहुँचे हुए हैं लेकिन मज़े की बात यह है कि उनमें से किसी ने उनको पहले देखा नहीं है, बस एक तसवीर देखी है, उसी का सहारा है।

एक्सप्रेस आयी। देख लिया। कहीं नहीं।

पंजाब मेल आयी। देख लिया। कहीं नहीं।

इतवार की शाम को बैठक थी और सबेरे छः बजे के क़रीब एक और एक्सप्रेस आती थी। अब बस यही आख़िरी आसरा था।

ट्रेन आयी, लगी और चली गई। सैकड़ों आदमी उतरे और चढ़े पर प्रेमचन्द नहीं आए, नहीं आए। गोष्ठीवालों के प्राण नहों में समा गए—अब कहाँ जाएँगे, कैसे लोगों को मुँह दिखाएँगे।

उदास, क्षुब्ध, मुसाफ़िरखाने की तरफ़ बढ़े। देखा, सीढ़ी के पास एक अधेड़ सज्जन, जिनके बाद कुछ सफ़ेद हो चले थे और जो सफ़र की थकावट से कुछ खिन्न-से हो रहे थे, गुमसुम खड़े हैं और कुली उनका ट्रंक सर पर और बिस्तर हाथ में लिए पूछ रहा है—बाबू कहाँ चलें?

इस मुसाफ़िर को उन लोगों ने कल रात ही को पंजाब मेल से उतरते देखा था, मगर पहचानते कैसे…

कोई विशेषता जो नहीं है उसमें।

अपने आस-पास ऐसा एक भी चिह्न वह नहीं रखना चाहता जिससे पता चले कि वह दूसरे साधारण जनों से ज़रा भी अलग है। कोई तिलक-त्रिपुंड से अपने विशेषत्व की घोषणा करता है, कोई रेशम के कुर्ते और उत्तरीय के बीच से झाँकने वाले अपने ऐश्वर्य से, कोई अपनी साज-सज्जा के अनोखेपन से, कोई अपनी किसी ख़ास अदा या ढब से, यहाँ तक कि एक यत्न-साधित, सतर्क सरलता भी होती है जो स्वयं एक प्रदर्शन या आडम्बर बन जाती है, शायद सबसे अधिक विरक्तिकर—देखो इतना बड़ा, इतना नामी आदमी होकर मैं कितनी सादगी से रहता हूँ! प्रेमचन्द की सरलता सहज है। उसमें कुछ तो इस देश की पुरानी मिट्टी का संस्कार है, कुछ उसका नैसर्गिक शील है, संकोच है, कुछ उसकी गहरी जीवनदृष्टि है और कुछ उसका सच्चा आत्मगौरव है जो किसी तरह के आत्म-प्रदर्शन या विज्ञापन को उसके नज़दीक घटिया बना देता है। नहीं, वह कस्तूरी मृग नहीं है जिसे अपने भीतर की कस्तूरी का पता न हो। उसे पता है कि उसके भीतर ऐसा भी कुछ है जो मूल्यवान है, उसका अपना है, नितान्त अपना, मौलिक, विशेष। वही उसका मोती है, मानिक है। कोई इस मोती-मानिक को उसके उपयुक्त रत्नजटित-मंजूषा में रखता है, यह आदमी उसे टीन के बकस में रखता है—इसलिए नहीं कि वह उसकी क़दर कम करता है बल्कि इसलिए कि बहुत ज़्यादा करता है। टीन के बकस में वह मोती ज़्यादा सुरक्षित है। वहाँ से कौन उसे चुरा सकता है, किसका ध्यान जाएगा उस पर! इसीलिए तो उटंगी धोती और मैली-सी एक फतुही पहने, तीसरे दर्जे के मुसाफ़िरख़ाने में बैठा हुआ-सा, टीन के बकस में अपना वह मोती जतन से छिपाए वह इतनी बेफ़िक्री से आगे-पीछे, दाएँ-बाएँ, सबका नाम-गाम पूछता है, उनके सुख-दुख, हारी-बेगारी, सूखे-बूड़े, रोज़ी-रोज़गार की बातें करता है और कोई हँसी की बात हो तो इतने ज़ोर से ठहाका लगाता है कि आस-पास बैठे हुए लोग चौंक पड़ते हैं और दीवारें हिल जाती हैं। शायद उसकी इस बेलौस हँसी में कहीं एक हल्की-सी चुहल भी छिपी हुई है—देखा, कैसा बुद्धू बनाया इन सबों को! कोई भाँप भी नहीं सका कि मेरे पास इस टीन के बकस में ऐसा एक मोती भी था जिससे दुनिया ख़रीदी जा सकती थी!

उसके ख़मीर में बच्चों जैसी शरारत का भी ख़ासा एक पुट है, जो अक्सर उसके लिखने में उभर आता है, इसलिए कभी-कभी लगता है कि अपनी इस सादगी में शायद उसे लुका-छिपी के खेल का भी कुछ मज़ा मिलता है!

जिस नितान्त साधारण, बँधी-टकी दिनचर्या से उसकी ज़िन्दगी का साँचा बना था, उसको देखते हुए शायद उस मोती के पानी को, उसकी चमक को बराबर बनाए रखने का दूसरा कोई उपाय भी न था। यह गहरी निश्छल सादगी शायद एक कवच थी जो प्रकृति ने स्वयं उसको बनाकर दिया था ताकि उस मोती की चमक कभी मन्द न हो—वैसे ही जैसे बादाम की मीठी गिरी को बनाए रखने के लिए उस पर एक कड़ा खोल चढ़ाना पड़ा।

ज़रा देखिए यह अन्दाज़ जिसमें मुंशीजी अपने एक दोस्त को अपने हालात नोट करा रहे हैं—

“तारीख़ पैदाइश सम्वत् 1937। बाप का नाम मुंशी अजायब लाल। सुकूनत मीज़ा मढ़वाँ, लमही, मुत्तसिल पांडेपुर, बनारस। इब्तदाअन् आठ साल तक फ़ारसी पढ़ी, फिर अंग्रेज़ी शुरू की।

बनारस के कालेजिएट स्कूल से एंट्रेंस पास किया। वालिद का इंतक़ाल पन्द्रह साल की उम्र में हो गया, वालिदा सातवें साल गुज़र चुकी थीं। फिर तालीम के सीग़े में मुलाज़िमत की। सन् 1901 में लिटररी ज़िन्दगी शुरू की…”

फिर छः सतरें इसके बारे में कि कब कौन किताब लिखी, क़िस्सा ख़तम पैसा हजम! और जब आत्मकथा लिखने पर आए तो पहले सब को आगाह कर दिया—

“मेरा जीवन सपाट, समतल मैदान है, जिसमें कहीं-कहीं गढ़े तो हैं, पर टीलों, पर्वतों, घने जंगलों, गहरी घाटियों और खण्डहरों का स्थान नहीं है। जो सज्जन पहाड़ों की सैर के शौक़ीन हैं, उन्हें तो यहाँ निराशा ही होगी।”

यानी कि जिसे आना हो, समझ-बूझकर आए!

और सच तो यह है कि अगर ऐसी कुछ बात ही न आ पड़ती तो शायद उस व्यक्ति ने अपने बारे में इतना भी न लिखा होता। कोई पूछता तो शायद वह कह देता : मेरी ज़िन्दगी में ऐसा है ही क्या जो मैं किसी को सुनाऊँ। बिलकुल सपाट, समतल ज़िन्दगी है, वैसी ही जैसी देश के और करोड़ों लोग जीते हैं। एक सीधा-सादा, गृहस्थी के पचड़ों में फँसा हुआ, तंगदस्त, मुदर्रिस, जो सारी ज़िन्दगी क़लम घिसता रहा, इस उम्मीद में कि कुछ आसूदा हो सकेगा मगर न हो सका। उसमें क्या है जो मैं किसी को सुनाऊँ। मैं तो नदी किनारे खड़ा हुआ नरकुल हूँ, हवा के थपेड़ों से मेरे अन्दर भी आवाज़ पैदा हो जाती है। बस इतनी सी बात है। मेरे पास अपना कुछ नहीं है, जो कुछ है उन हवाओं का है जो मेरे भीतर बजीं। मेरी कहानी तो बस उन हवाओं की कहानी है, उन्हें जाकर पकड़ो। मुझे क्यों तंग करते हो!

डॉ. तुलसीराम की आत्मकथा 'मुर्दहिया' का एक अंश

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प्रेमचंद
प्रेमचंद (31 जुलाई 1880 – 8 अक्टूबर 1936) हिन्दी और उर्दू के महानतम भारतीय लेखकों में से एक हैं। मूल नाम धनपत राय श्रीवास्तव, प्रेमचंद को नवाब राय और मुंशी प्रेमचंद के नाम से भी जाना जाता है। प्रेमचंद ने हिन्दी कहानी और उपन्यास की एक ऐसी परंपरा का विकास किया जिसने पूरी सदी के साहित्य का मार्गदर्शन किया। आगामी एक पूरी पीढ़ी को गहराई तक प्रभावित कर प्रेमचंद ने साहित्य की यथार्थवादी परंपरा की नींव रखी।

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