काले ख़त का विरोध

‘Kale Khat Ka Virodh’, a poem by Usha Dashora

काले रंग के ख़तों ने
गुलाबी होने का विरोध किया है

सुन्दरता 4×6 की कोठरी वाली
क़ैद नहीं
गंध, हवा, रोशनी की शक्ल है
रात और दिन में पूरा हुआ धरती का एक चक्र भी

हे पाठक
अब यह समस्या तुम्हारी है भाई
कि मलिक मोहम्मद जायसी की नायिका धवल है

पर आज काले ख़त
काले केश
काली आँखें
इंचटेप से नापी नख-शिख की
ग़ुलाम व्याख्या के ख़िलाफ़ नारे लगाते हैं

मेरी अँगुली का इशारा देखो
जहाँ तुमने काले विशेषण के बीज फेंके
वहाँ स्त्री पेड़ों का संगीत
गले की नसों को तानकर
मुख्य धारा पर बैठा
ऊँचे स्वर में गा रहा है

और तुम उसी के
आत्मविश्वासी गर्भ में क्लांत लेटे
राग यमन पर विश्राम कर रहे हो
उसी की उधारी ऑक्सिजन को
अपने भीतर पी रहे हो

हे धवल प्रेमी
स्त्री का रंग और सौन्दर्य
कोई वास्तुकला का नमुना नहीं है
कि तुम्हारे मनरूप उसमें
ईंट, पत्थर, गारा
रंग और डिज़ाइन
जोड़ी-तोड़ी जाए।

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