उनके पास कपड़े थे
किसी के पास ढेर सारे
तो किसी के पास बनिस्बत कुछ कम
जिन्हें पहनकर निकलने पर
कुछ लोगों ने उन्हें नग्न कहा

और जिन लोगों ने नग्न कहा
उनके पास भी ख़ूब कपड़े थे
तो किसी के पास बनिस्बत कुछ कम भी
जिन्हें पहनकर निकलने पर
उन्हें कोई नग्न नहीं कह सकता था

फिर हुआ यह कि
कपड़ों व चरित्र के मध्य नैतिक जंग छिड़ गई
यह ज़ुबानी जंग धीरे-धीरे उनकी देह-आत्मा पर उतर आयी…

अब
हालात यह है कि
पहले वे पायी जाती थीं
अधमरी या पूरी तरह गला घोंटी हुई
रेल-पटरियों पर कटी-फटी
गीली सड़ी-गली लाश के रूप में

अब वे बरामद होने लगी हैं
अधजली… या पूरी तरह ज़िंदा भुने हुए गोश्त के रूप में,
जिनकी चिरमिरायी गन्ध से मानसिक-विचलन तो है
कि हमारी गेंद किस पाले में होनी चाहिए
लेकिन सबकी पीठ
धरा पर बढ़ते जा रहे
इन ज़िंदा सुलगते श्मशानों की तरफ़ स्तब्ध/मौन है
हमारी व्यक्तिगत प्रतिबद्धताएँ/मजबूरियाँ मुँह बाये खड़ी हैं…!

प्रतीक्षा करें!
शीघ्र ही… हम सब
फिर अगली तीखी नैतिक-ज़ुबानी जंग हेतु लामबंद होंगे!

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मंजुला बिष्ट
बीए. बीएड. गृहणी, स्वतंत्र-लेखन कविता, कहानी व आलेख-लेखन में रुचि उदयपुर (राजस्थान) में निवास इनकी रचनाएँ हंस, अहा! जिंदगी, विश्वगाथा, पर्तों की पड़ताल, माही व स्वर्णवाणी पत्रिका, दैनिक-भास्कर, राजस्थान-पत्रिका, सुबह-सबेरे, प्रभात-ख़बर समाचार-पत्र व हस्ताक्षर, वेब-दुनिया वेब पत्रिका व हिंदीनामा पेज़, बिजूका ब्लॉग में भी रचनाएँ प्रकाशित होती रहती हैं।