कपड़े व चरित्र

‘Kapde Va Charitra’, a poem by Manjula Bist

उनके पास कपड़े थे
किसी के पास ढेर सारे
तो किसी के पास बनिस्बत कुछ कम
जिन्हें पहनकर निकलने पर
कुछ लोगों ने उन्हें नग्न कहा

और जिन लोगों ने नग्न कहा
उनके पास भी ख़ूब कपड़े थे
तो किसी के पास बनिस्बत कुछ कम भी
जिन्हें पहनकर निकलने पर
उन्हें कोई नग्न नहीं कह सकता था

फिर हुआ यह कि
कपड़ों व चरित्र के मध्य नैतिक जंग छिड़ गई
यह ज़ुबानी जंग धीरे-धीरे उनकी देह-आत्मा पर उतर आयी…

अब
हालात यह है कि
पहले वे पायी जाती थीं
अधमरी या पूरी तरह गला घोंटी हुई
रेल-पटरियों पर कटी-फटी
गीली सड़ी-गली लाश के रूप में

अब वे बरामद होने लगी हैं
अधजली… या पूरी तरह ज़िंदा भुने हुए गोश्त के रूप में,
जिनकी चिरमिरायी गन्ध से मानसिक-विचलन तो है
कि हमारी गेंद किस पाले में होनी चाहिए
लेकिन सबकी पीठ
धरा पर बढ़ते जा रहे
इन ज़िंदा सुलगते श्मशानों की तरफ़ स्तब्ध/मौन है
हमारी व्यक्तिगत प्रतिबद्धताएँ/मजबूरियाँ मुँह बाये खड़ी हैं…!

प्रतीक्षा करें!
शीघ्र ही… हम सब
फिर अगली तीखी नैतिक-ज़ुबानी जंग हेतु लामबंद होंगे!

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