कवि के स्वप्नों का महत्त्व!—विषय सम्भवतः थोड़ा गम्भीर है। स्वप्न और यथार्थ मानव-जीवन-सत्य के दो पहलू हैं : स्वप्न यथार्थ बनता जाता है और यथार्थ स्वप्न। ‘एक सौ वर्ष नगर उपवन, एक सौ वर्ष विजन वन’—इस अणु-संहार के युग में इस सत्य को समझना कठिन नहीं है। वास्तव में स्वप्न और वास्तविकता के चरणों पर चलकर ही जीवन-सत्य विकसित होकर आगे बढ़ता है।

सामान्य दिवा-स्वप्नों और कवि के स्वप्नों में भेद होता है : दिवा-स्वप्न अतृप्त आकाँक्षाओं की उपज होते हैं और कवि के स्वप्न युग की आवश्यकताओं की सम्भावित सृष्टि अथवा समय की माँगों की पूर्ति।

उनकी पृष्ठभूमि में ऐतिहासिक संचरण होता है और उनका आधार होता है हमारे जीवन की या भू-जीवन की प्रगति का सत्य।

कौन नहीं जानता कि आज धरती पर घोर अन्धकार चल रहा है—विश्वव्यापी संहार का निर्मम कुत्सित रंगमंच तैयार हो रहा है और सभ्यता के विनाश का अभिनय अथवा रिहर्सल आए दिन भीषण अस्त्र-शस्त्रों की परीक्षाओं के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। साथ ही दूसरी ओर कुछ प्रबुद्ध, युगचेतन मानस जाति-पाँति, वर्गश्रेणियों से मुक्त, दैन्य-अविद्या के अभावों से सदैव के लिए संरक्षित, नवीन मानवता के निर्माण के स्वप्नों को कलाशिल्प, शब्द अथवा नवीन सामाजिक चेतना एवं जीवनरचना के द्वारा मूर्त करने के प्रयास में संलग्न हैं। सदियों की दासता से मुक्त अपना विशाल देश आज स्वयं विराट लोकनिर्माण की कृच्छ्र साधना में तत्पर एड़ी से चोटी तक पसीना बहा रहा है।

सूरज-चाँद-सितारों के साथ खेलनेवाली यह सुनहली हरी-भरी धरती—इसकी सुन्दरता का कहीं अन्त है? आकाश की हँसमुख नीलिमा को देखते जी नहीं अघाता। तारों की भूलभुलैया में आँखें खो जाती हैं। आग, मिट्टी, पानी, हवा और आकाश ये सब कितने प्यारे, कितने विचित्र हैं! रंग-रंग के गन्ध भरे मौन फूल—उड़तीं तितलियाँ और चहकती हुईं चिड़ियाँ—सब कितनी सुन्दर, कितनी मधुर है!—इस धरती पर चलने-फिरनेवाले जीवन की एक अलिखित रहस्य भरी कथा है—और उस जीवन की प्रतिनिधि स्वरूप मानव-जाति का अपना एक बृहत् अकथित इतिहास है। सभ्यताओं का विकास, संस्कृतियों का निर्माण—भाषाओं की उत्पत्ति और साहित्यों की रचना—बनैले पशुओं से भरे घने जगलों के स्थान पर विशाल जन-नगरों की स्थापना—देश-काल की पलकों पर झूलते हुए वास्तविकता के इन स्वप्नों की अपनी एक सार्थकता है। और यह है विश्व-जीवन का एक मोहक व्यापक चित्र।—आइए थोड़े और निकट से देखिए। औद्योगिक क्रान्ति!—और उसके बाद मानव-जीवन में, उसके रहन-सहन में होनेवाली कायापलट!—भूत विज्ञान का अविराम विकास : नयी शक्तियों की उपलब्धि : जिनके बल पर मनुष्य आज आकाश के ज्योतिर्मय ग्रहों पर अपने उपनिवेश बनाने की बात सोच रहा है। पर क्या यहीं मनुष्य के स्वप्नों का अन्त हो गया? ज़रा और पास से देखिए : इस भाप और कोयले के भद्दे युग को! यह वैज्ञानिक युग का पहिला ही चरण है। क्या रेल की सीटी आपके कान के परदे नहीं फाड़ दे रही है? उफ़, इन लोहे की पटरियों पर दौड़ते हुए पहियों की खड़खड़ाहट—धूल और धुआँ। यह क्या मनुष्य की शरीर-रचना के अनुकूल है?—और देखिए, इन बनियों, पूँजीपतियों की सभ्यता और संस्कृति को। इनकी साम्राज्यवादी तृष्णा को—उपनिवेश स्थापित करने के स्वप्नों को—बड़े-बड़े राष्ट्रों की परस्पर शक्ति और वाणिज्य सम्बन्धी स्पर्धा को। एक देश द्वारा दूसरे देशों के, एक मनुष्य द्वारा अन्य मनुष्यों के निर्दय अमानुषी शोषण को। सभ्य देश आज विश्व-विध्वंसक अणु उद्जन बम बनाने में व्यस्त हैं, नये ब्रह्मास्त्रों को जन्म देने के हेतु व्यग्र हैं, जिनसे पलक मारते ही भू-खण्डों का विध्वंस हो सकता है। विज्ञान के उत्पातों के अतिरिक्त भी अभी तक धर्म सम्प्रदाय सम्बन्धी घोर मतभेद, जाति-वर्ण सम्बन्धी निर्मम पूर्वग्रह दूर नहीं हुए हैं। आप और कहीं नहीं जा सकते तो अपने देश के गाँवों ही का निरीक्षण कीजिए—यह सदियों से पुंजीभूत अपरिमेय दारिद्रय, अन्धविश्वास और अशिक्षा। हमारे गाँवों की मानवता का रहन-सहन, उनके रहने के मिट्टी के घरौंदे—अर्थहीन रूढ़ि-रीतियों में जकड़ा जन-समुदाय का अस्थिपंजर जर्जर-जीवन। क्या नरक की विभीषिका की वास्तविकता इस सबसे बड़ी हो सकती है?

तो, ऐसी आज की धरती पर और युग-युग से घूमती हुई इस धरती पर मनुष्य की वीभत्स वासना, तृष्णा और लोभ के अन्ध उद्दाम भँवर स्वरूप इस संसार-चक्र से मर्दित, रक्तस्रवित कवि-हृदय से आप क्या आशा रखते हैं? वह स्वप्न देखना छोड़कर, आकाश में उड़ना छोड़कर आज की वास्तविकता के कल्मष में स्वयं भी सन जाए? वह मनुष्य के मन पर जमे हुए कठोर कुरूप अन्धकार के वज्र कपाट पर अपने प्रकाशपुँज शब्दों की अविराम मुट्ठियों का प्रहार करना छोड़कर इस घृणित चक्की के पाटों के नीचे स्वयं भी पिस जाए?

यह तो मानव के हृदय पर उसकी मोहान्धता की विजय होगी—आज के युग पर उसकी सर्वसंहारकारिणी पैशाचिक प्रवृत्ति की विजय होगी—यदि आप कवि के स्वप्नों को उसका जीवन से पलायन कहते हैं, यदि आप कवि से चाहते हैं कि वह भी आज की तथाकथित महान शक्तियों की तरह A Tooth for a tooth के या ‘शठं प्रति शाठ्यं कुर्यात्’ के वास्तविकतावादी सिद्धान्त को अपनाए तब तो यह मनुष्य की तर्कबुद्धि की घोर विडम्बना होगी, मानव के विवेक की घोर पराजय होगी। क्रूर पशुबल अथवा अन्ध आसुरी शक्ति का सिद्धान्त तो इस अणु-बल के युग में अपनी पराकाष्ठा तक पहुँचकर स्वयं खोखला, अर्थहीन, वीभत्स, नारकीय तथा आत्म-पराजित प्रमाणित हो चुका है। तथाकथिक वास्तविकता और यथार्थ—वे अपने ही किमाकार बोझ से दबकर आज ध्वस्त हो रहे हैं। वास्तविकता और यथार्थ को आज अपनी सीमाओं से बाहर निकलकर—अपनी मान्यताओं के डिम्ब कवचों को तोड़कर नये जीवन के धरातल में प्रवेश करना है।

तो, आइए, कवि के साथ मानव-चेतना के ऊँचे शिखरों पर विचरण कीजिए : इस कलुष-कर्दम भरी धरती पर नवीन मनोबल के पैरों पर चलकर आगे बढ़ना सीखिए; मानव-भविष्य के प्रति दृढ़ आशा और आत्मविश्वास के पंखों पर उड़ान भर, धरती के धुएँ और कुहासे से ऊपर उठकर, मुक्त व्यापक विवेक के वातावरण में विचरण कीजिए! कब तक इतिहास के जाति वर्ण वादों के वैमनस्य और विद्वेष भरे विभाजनों में बँटे रहिएगा? कब तक धर्म-सम्प्रदाय-वर्गों की दीवारों से घिरे रहकर संसार को कारागार बनाए रखिएगा? विगत का इतिहास विकासशील मानव-मन और जीवन की छाया है। इस छाया मन के प्रेतों को अपने पूर्वग्रहों से वास्तविकता प्रदान कर उनके सम्मुख पराजित होना छोड़िए। छोड़िए इस मिथ्या अभिमान को, थोथे ज्ञान को, देश, जाति, कुल-वंश के अहंकार—युगों के घोर अन्धकार को।—क्या मानव-प्रेम और मानवसमानता से बड़ा कोई और धर्म है? क्या मानव-एकता से बड़ा कोई और ऐश्वर्य है? धरती पर आज देह, मन, प्राण के वैभव में सम्पन्न शिक्षित संस्कृत सौन्दर्यप्रिय मानवता एक ही आनन्द तथा चैतन्य सिन्धु की अगणित तरंगों की तरह मुखरित अपनी जीवन लीला का विस्तार करे—यह आपको अच्छा लगता है या राष्ट्र, वर्ग-धर्म, नीति-सम्प्रदाय—तुच्छ मतों-वादों, क्षुद्र गुटों और संकीर्ण गिरोहों में बँटी, बिखरी, परस्पर घृणा-द्वेष, दर्प-क्रोध, झूठे पाण्डित्य, थोथे सिद्धान्तों और दानवीय सैन्य एवं शस्त्र बल का प्रदर्शन करती हुई आत्मघातक, विश्वविनाशक आज की यह कीड़े-मकोड़ों की तरह दैन्य-दुःख-अशिक्षा के अभावों के कीचड़ में रेंगनेवाली यथार्थ और वास्तविकता की प्रतिकृति मनुष्यता आपको पसन्द है?

तो, कवि के रक्त के आँसुओं से धुले स्वप्नों की वकालत करने की आवश्यकता नहीं है। कवि की वाणी में निःसन्देह ईश्वरीय संगीत बहता है : उसके हृदय के अजिर में दैवी प्रकाश आँख-मिचौनी खेलता है। उसके विषादसिक्त हृदय के सौन्दर्य-मधुर स्वप्नों से जीवन-मंगल तथा लोककल्याण की सृष्टि होती है। आइए, तर्कों, वादों के घृणित दलदल से बाहर निकलकर कवि के अग्निपंख सुनहले स्वप्न-बीजों को मानस में बोकर नवमानवता की, व्यापक मनुष्यत्व की हँसमुख जीवन्त फ़सल उपजाइए और इस मानव-अज्ञान के अन्धकार में सोयी हुई जड़ धरती को मानवआत्मा के जागरण के प्रकाश के जीते-जागते जीवन-सौन्दर्य के स्वर्ग में परिणत कर मानव-हृदय के प्रतिनिधि कवि के स्वप्नों को श्रद्धांजलि दीजिए। एवमस्तु!

सुमित्रानन्दन पन्त का निबन्ध 'मैं क्यों लिखता हूँ'

Book by Sumitranandan Pant:

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सुमित्रानन्दन पन्त
सुमित्रानंदन पंत (20 मई 1900 - 28 दिसम्बर 1977) हिंदी साहित्य में छायावादी युग के चार प्रमुख स्तंभों में से एक हैं। उनका जन्म कौसानी बागेश्वर में हुआ था। झरना, बर्फ, पुष्प, लता, भ्रमर-गुंजन, उषा-किरण, शीतल पवन, तारों की चुनरी ओढ़े गगन से उतरती संध्या ये सब तो सहज रूप से काव्य का उपादान बने। निसर्ग के उपादानों का प्रतीक व बिम्ब के रूप में प्रयोग उनके काव्य की विशेषता रही। उनका व्यक्तित्व भी आकर्षण का केंद्र बिंदु था। गौर वर्ण, सुंदर सौम्य मुखाकृति, लंबे घुंघराले बाल, सुगठित शारीरिक सौष्ठव उन्हें सभी से अलग मुखरित करता था।

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