किसी बच्चे की आत्मा को
रोककर ग्यारह की आयु में
दी जाए उसे तीस बरस की हँसी
बीस बरस की नवयौवना बादामी आँखें
शिवत्व की ओर बढ़ती जटाओं से केश

दी जाए उसे एक दिन के फूल की सौम्यता, निर्दोषपन
रात के गाढ़े काले पहर सी नींद
ऊषा के कुछ क्षणों सा उनींदापन

भर दिया जाए हृदय उसका
पुरानी शराब के नशे से
छिंड़क दिया जाए उसके रोमों पर
ताज़ा पिघला सोना

उसकी चाल को दी जाए आँधियों की हवा सी बेफ़िक्री
उसके होंठों को दी जाए
रात में खड़खड़ाते पीपल के पत्तों सी उनमुक्तता

दी जाए श्वासों में
खेतों की काली मिट्टी और नहर के पानी की खुशबू
भिगो दी जाए उसकी ज़ुबाँ
गाँव की बोली के शरबत से

बड़ी चालाकी से बनाया जाए उसे बस बाईस का
दिया जाए बरगद की कोंपलों का स्निग्ध-भारी स्पर्श
और उड़ेल दिया जाए उस पर
पारा मिला, सूरज का सनातन रंग

तब वह अस्तित्व
तब वह भाव
तब वह लड़की
कविता कहलाती है।

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पुष्पेन्द्र पाठक
दिल्ली विश्वविद्यालय में शोधार्थी। Email- [email protected] Mobile- 9971282446

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