शोर करोगे! मारेंगे
बात कहोगे! मारेंगे
सच बोलोगे! मारेंगे
साथ चलोगे! मारेंगे
ये जंगल तानाशाहों का
इसमें तुम आवाज़ करोगे? मारेंगे…

जो जैसा चलता जाता है, चलने दो
दीन-धरम के नाम की लाठी चलने दो
हिन्दू-मुस्लिम भाई-भाई का नारा
ख़बरों के संग जल जाता है, जलने दो।

हक़ माँगोगे! मारेंगे
आगे बढ़ोगे! मारेंगे
प्रश्न करोगे! मारेंगे
अड़ जाओगे! मारेंगे

देश को सत्ता की साज़िश में मिटने दो
हत्यारों का नंगा नाच है! करने दो
अपनी ख़ाली थाली देख के ठण्ड रखो
अपना हिस्सा उनके घर में फलने दो
हमसे तुम फ़रियाद करोगे! मारेंगे।

हमसे लड़ोगे! मारेंगे
जहाँ मिलोगे! मारेंगे
चौराहों पर मारेंगे
घर में घुसकर मारेंगे

हाथ हमारे बस इतना है
हर मुद्दा बस एक फ़ित्ना है
जल्लादों में युद्ध ठना है
देखेंगे किसका कितना है

जो भी झूठ की बात करेगा! मारेंगे
जो भी सच के साथ रहेगा! मारेंगे!

शिवम चौबे की कविता 'कभी न लौटने के लिए मत जाना'

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शिवम चौबे
बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय से स्नातक। इलाहाबाद विश्वविद्यालय से हिन्दी साहित्य में परास्नातक। फिलहाल अध्ययनरत। कविताएँ लिखने पढ़ने में रूचि। संपर्क- [email protected]

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