‘Khali Mulaqat’, a poem by Rag Ranjan

हम एक अनजान रास्ते पर ख़ूब चले

हम चलते-चलते सहसा रुके
और एक-दूसरे से पूछा-
हम भाग रहे हैं कहीं से
या जा रहे हैं कहीं

हमने नए सवाल सीखे
हमने सवालों के साथ दूर तक चलना सीखा

हमने हवा में उड़ते एक टूटे पंख पर बात की
और किसी चिड़िया की
थकी हुई उड़ान के बारे में सोचते हुए
एक साथ उदास हुए,
अगले पल देखी हमने
वह पतंग जो कटकर
उलझी थी बिजली के तार में
अब भी बंधी थी धागे से

तुम्हें याद होगा,
ऐन उसी वक़्त
कहीं ठहरकर
हमने उस कहानी को याद किया
जिसमें नायिका अपने भीतर एक शहर की कल्पना करती है, जिसमें सिर्फ़ एक दरवाज़ा है
जिससे होकर वह जब चाहे जा सकती है
और लौटकर आ सकती है अकेली…
और एक दिन कहानी का दूसरा पात्र दरवाज़े पर दस्तक देता है

और शहर ग़ायब हो जाता है हमेशा के लिए

मज़े की बात,
हममें से किसी ने यह कहानी पहले नहीं सुनी थी
और मान बैठे थे कि यह हमारी कहानी थी
हम कितना उलझे थे इस बात पर
कि दरवाज़े पर दस्तक देने वाला हम दोनों में से कौन था

हमने ‘काश’ से शुरू होने वाले
तीन-तीन वाक्य बनाए
और इस तरह छह बार
अपने एक सच को
एक-दूसरे से छुपाया।

मैंने वह कहानी अगली बार सुनाने का वादा किया
जो मैंने कभी नहीं सुनी थी
तुमने अपनी नोटबुक कुछ सोचकर वापस बैग में रख ली थी

मैंने कुछ नहीं पूछा था तुमसे

इस तरह
हमने अगली मुलाक़ात की तैयारी में
एक मुलाक़ात ख़ाली की।

यह भी पढ़ें: परवीन शाकिर की नज़्म ‘ख़ुद से मिलने की फ़ुरसत किसे थी’

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