संग्रह ‘निषेध के बाद’ से

जी हाँ, आप बता नहीं सकते
कि आदमी के नाम पर
जिन वैध-अवैध शरीरों को आप देख रहे हैं
उनमें से
किसके भीतर ख़रगोश है
और किसके भीतर चीता

फिर मुझे कहने से रोका जाता है
इन शरीरों की हक़ीक़त
और यह पता चलते ही
कि मैं कहने का दुस्साहस कर रहा हूँ
लोगों के कान खड़े हो जाते हैं
(हालाँकि खड़े कान अब तक मैंने सिर्फ़ गधों के देखे थे)
और वे न सुनने का अभिनय करते हुए
आगे बढ़ जाते हैं
बिल्कुल उस देश की तरह
जहाँ लोकतन्त्र होता है
और आदमी
आदमी के अलावा और किसी भी तरह जीवित रह सकता है

फिर ग़ुस्से में आकर लोग
कविता पर बात करने लगते हैं
और रह-रहकर मज़ाक़ पर उतर आते हैं
जी हाँ, अब तो आप कविता को मज़ाक़ से बाहर लाइए
कविता
उन
टुकड़ों का नाम नहीं है
जिन्हें आप भीड़ में बटोर लेते हैं
कविता की प्रक्रिया से गुज़रना
फाँसी से मुक्त होने की छटपटाहट से कम नहीं है

जी हाँ, इसीलिए मैं पता लगा रहा हूँ
कि किस आदमी के भीतर ख़रगोश है
और किस आदमी के भीतर चीता
ताकि अपने अग्रजों और हमउम्रों को बता सकूँ
कि कविता का सही ढाँचा यहाँ है
वहाँ नहीं, जहाँ तुम अण्डा को झण्डा से जोड़ रहे हो
या माँ-बाप को गालियाँ दे रहे हो

जी हाँ, मैंने कहा है
और फिर कह रहा हूँ
कि भूख कोई फ़ैशन नहीं है
कविता कोई मैच नहीं है
भले ही शासन
कोई स्विमिंग पूल हो
और संसद
कोई सर्कस

जी हाँ, मैं यह भी कह रहा हूँ
कि आपकी शय्या पर
आपसे पहले जो बिछे हैं
वे वस्त्र नहीं, फूल हैं
अतः ज़िद में आप
नंगे होकर भले घूमें
पर फूलों को जंज़ीरों में न बाँधें

जी हाँ
इसे आप भाषण समझ सकते हैं
लेकिन सच यह है
कि मैं ख़रगोश और चीते की तलाश में हूँ।

अब्दुल बिस्मिल्लाह की कविता 'शरीफ़ लोग'

Book by Abdul Bismillah: