ख़त जो गुमनाम थे

कृष्णा अग्निहोत्री की हिन्दी कहानी ‘ख़त जो गुमनाम थे’ | ‘Khat Jo Gumnam The’, a story by Krishna Agnihotri

आदित्य पांच फुट आठ इंच का गठीले जिस्म वाला नवजवान है। आधुनिक वेषभूषा और कटीली मूंछों के बीच अपनी वह अलग ही शिनाख़्त रखता है। साहित्यिक रस भरी बातों से उसके गाल गुलाबी हो जाते हैं और नेत्रों की चपलता बालक-सी बैठ जाती है। ओंठ बरबस अनजाने में ही मुस्करा उठते हैं जिससे उसका पूरा व्यक्तित्व मादक हो जाता है। अपने इस प्रभावशाली व्यक्तित्व के साथ वह जब पुलिस विभाग में चुना गया तब भी वह असन्तुष्ट हो निरन्तर शिक्षा विभाग के लिए प्रयत्न करता रहा… उसे सचमुच ही शिक्षाविभाग से लगाव था।

वह भी क्या सुहावना भाग्यशाली दिन था जब उसकी नियुक्ति खरगोन महाविद्यालय में हुई थी। दिव्या सिंह उसके विभाग में न होकर भी उसे पसन्द करती थीं… उन्हें यह बात बहुत अच्छी लगी थी कि आदित्य सचमुच में एक आश्चर्यजनक व्यक्ति है, जो एडमिनिस्ट्रेटिव पोस्ट का लालच छोड़ शिक्षा-विभाग में आया है अन्यथा रुपये व पद के मोह से कई व्याख्याता तहसीलदार व थानेदार तक होना पसन्द करते हैं।

दिव्या की तेज़ बुद्धि और विवेकशीलता से आदित्य भी एकदम प्रभावित हो गया। राजपूत घराने की संवरी-सधी दिव्या आदित्य के बहुत नज़दीक पहुंच गयी। परन्तु वे दोनों बहुत सन्तुलित थे और उनके निर्णय उन तक ही सीमित थे। आदित्य समय की प्रतीक्षा कर रहा था जब वह अपनी माँ से इस अन्तर्जातीय विवाह की बात छेड़ सके क्योंकि वह अपनी माँ के ज़िद्दी स्वभाव से परिचित था। तुरन्त एक लावा फूटेगा और वह कटुता से कह देंगी- “तेरी इन दो छोटी बहनों को क्या कुएं में ढकेल दूँ?”

अभी वह समय-असमय की कशकशम में डूब और उतर ही रहा था कि उसके कुछ शुभचिन्तक सहकर्मियों ने एक गुमनाम पत्र द्वारा उसकी माँ को दिव्या व उसके विषय में बेहद भौंडे ढंग से सब लिख भेजा।

माँ को अब दिव्या एक घटिया लड़की लगने लगी और उन्होंने आमरण अनशन की ठानी। आदित्य के भाई ने माँ को बहुत समझाना चाहा परन्तु बात बिगड़ती गयी।

अन्त में भावुक आदित्य ही प्यार को त्याग माँ के प्रति कर्त्तव्य पूरा करने के लिए तैयार हो गया। उसने माँ को वचन दिया कि वह दिव्या से विवाह नहीं करेगा।
दिव्या ने गहन समझदारी से आदित्य के इस निर्णय को स्वीकारा- “ठीक है आदित्य, तुम अपने परिवार से कटकर अधूरे रहते और हमारा वैवाहिक जीवन इस अधूरेपन से कभी भी ख़ुश व पूर्ण नहीं हो पाता।”

इस सबके बावजूद आदित्य का रोष अपने आसपास के बुद्धिजीवियों के प्रति बढ़ता… आख़िर ये पढ़े-लिखे लोग भी इतने कायर क्यों हैं? पीठ में छुरा भोंकना भी क्या इतना बड़ा सुख है?

इतने पर भी तो आदित्य अपनी माँ को समझा नहीं पाया… यों ही एक दिन वह दिव्या के साथ महाविद्यालयीन ख़रीददारी कर रहा था तो वह बात भी माँ के कान तक जा पहुंची। वे चीख़ने लगीं- “जब तू दिव्या से शादी नहीं करना चाहता तो शादी क्यों नहीं कर लेता?”

आदित्य ने अपना रोष बहुत चुप रहकर व्यक्त किया। ग्रीष्मावकाश में उसने चुपचाप अपनी जाति की एक अति साधारण-सी लड़की नीलिमा से शादी तय कर ली और माँ को केवल सूचना मात्र दे दी।

माँ प्रसन्नतापूर्वक बहू को अंगूठी पहनाने गयीं तो हक्का-बक्का हो गयीं। लगभग रो आयीं। लम्बी हड्डी के ढांचे-सी दुबली-सांवली नीलिमा की नाक आवश्यकता से अधिक ऊंची और आंखें एकदम ख़ाली-ख़ाली।

रहने-बोलने-चलने में फूहड़पन। इसके पहले कि माँ पुनः अपना आमरण अनशन का नुस्खा अपनाती, आदित्य ने अपनी अटैची तैयार कर ऐलान कर दिया- “विवाह से इनकार करोगी तो अब मैं घर नहीं लौटूँगा।”

महाविद्यालय खुला। दिव्या के सामने जाना कितना कठिन था। परन्तु वह स्वयं ही सहजता से आ खड़ी हुई।

“मुझे सूचना तक नहीं? एक उपहार ही दे जाती।”

“जो दे चुकीं, वह क्या कम है?”

“ख़ुश तो हो?”

“नीलिमा को देख लेना, समझ जाओगी।”

“बड़े डरपोक निकले।”

“जीवनभर अभाव से जूझना कायरता नहीं।”

आदित्य का चेहरा बुझा था।

पता नहीं क्यों आदित्य के एक सहकर्मी ने नीलिमा के सामने दिव्या की बात कर दी । बस वह जब-तब दिव्या का नाम चबाकर थूक जैसा आदित्य के सामने फेंक देती। इस पर भी आदित्य दिव्या के सामने सहज ही रहता।

वे वैसे ही स्टाफ़ रूम में बैठते, साथ ही कक्षाओं में जाते और छुट्टी में कैंटीन में चाय पीते। उनकी व्यवस्थित मुद्रा ने स्टाफ़ में बौखलाहट मचा दी और अब उनके घुसते ही फुसफुसाहटें बढ़ने लगतीं। एक दिन बहुत ही भद्दे ढंग से आदित्य के एक सहकर्मी ने टोका- “यार, क़िस्मत हो तो ऐसी, दोनों हाथ लड्डू! घर में बीबी, यहां प्रेयसी।”

आदित्य चीख़ पड़ा था— “ज़रा पुनः तो कहो।”

बात प्राचार्य तक आ पहुंची और उन्होंने भी आदित्य से कहा— “समाज में रहने के लिए सीमाएं रखनी पड़ती हैं।”

समझ नहीं आ रहा था आदित्य को… भला एक अच्छी आत्मीयता सीमाविहीनता के दायरे में कैसे बंध गयी? और तभी नीलिमा के पास उसके हफ़्तेभर के छोटे-छोटे कार्य गुमनाम पत्र से पहुंच जाते।

हारकर आदित्य ऊब गया था और नीलिमा को ख़ुश रखने के लिए उसने स्थानान्तर माँग लिया।

2

वह लड़कियों का छोटा-सा महाविद्यालय था।

हलकी नारंगी कमीज़ पहने आदित्य को लड़कियों के जत्थे बहुत स्नेह से देख रहे थे। एक ने कुछ ज़ोर से कहा भी था— “यार, पहली बार बसन्त बहार आयी है, नये सर हैं बहत स्मार्ट। उसके डिपार्टमेण्ट की मैडम बीमारी की छुट्टी पर थीं… तब भी आदित्य लड़कियों के हौसले के साथ ख़ुश था।

छोटा-सा स्टाफ़ था, सबसे अच्छा रहने वाला आदित्य सभी का प्रिय पात्र था। एक ही बात आदित्य को नापसन्द थी। वह उन सबकी नुक्ताचीनी वाली बात सह नहीं पाता। महिला व्याख्याताओं की पीठ मुड़ते ही पुरुष मण्डली चटखारे लेने लगती और अच्छी-ख़ासी मुलाक़ातों का कचरा बना डालती- “वो मिस कपूर है न? जब देखो कमबख़्त खन्ना के स्कूटर पर ऐसे घूमती है जैसे उसकी रखैल हो।”

“और वो मित्रा? बनी हुई है… पुरुषों से ऐसे घबराती है जैसे देखते ही पिघल जायेगी। अपनी सूरत तो देखे। आंखों के नीचे स्याह दाग और बाल
खिचड़ी।”

आदित्य इन सबसे उदासीन हो पुस्तकालय में जा बैठता।

ऐसे ही वह जब एक उदास दिन को काट रहा था तब खुली हंसी के साथ गोरी और बेहतरीन उस सुन्दर स्त्री ने उससे प्रश्न किया- “आपने टाइम टेबल तो चेन्ज नहीं किया न?”

“नहीं आप कब लौटीं?” आदित्य मुस्करा उठा।

“आज ही! चाय पीते हो न!”

“हाँ, चलिए।” वाक्य आदित्य ने पूरा किया।

प्रिया क्या आयी, महाविद्यालय की सुनसान घड़ियां घंटियों जैसी बजने लगीं।

वे एक पल भी उसे अकेला नहीं छोड़ती। न जाने कितनी फुरती थी उनमें… सुबह से ही कभी मटर की कचौरियां तो कभी मठरी कुछ भी ताज़ा बना लातीं।
खाने-पीने का शौक़ीन आदित्य जब उस सबको बहुत प्यार से खाता तो वे बहुत ख़ुश होतीं। एकदम तृप्ति से जैसे वे भर जातीं।

“तुम्हें तो होटल ही में खाना पड़ता है न? मेरे घर आ जाया करो- बढ़िया खाना खिलाऊंगी।”

आदित्य उनके घर जा पहुंचा। उस दिन मैडम प्रिया नारंगी रंग में अनुपम लग रही थीं परन्तु हर पल जैसे उन्हें कुछ चुभ रहा था। आदित्य ने उन्हें सहेजा और उन्होंने मुक्त भाव से अपना मन खोल दिया।

कितनी निजी परेशानियों और समस्याओं को ले व्यक्ति हाथ-पैर फेंकता है और हंसना चाहता है यह आदित्य के अतिरिक्त मैडम प्रिया भी जानती थीं। उनके मेजर पति ने जब किसी पहाड़िन से विवाह कर लिया तो प्रिया ने भी दूसरा विवाह किया लेकिन वह सही समय पर सही निर्णय नहीं ले सकीं। दूसरा पति विलायत गया तो लौटा ही नहीं। बस समाज में प्रिया के नाम के साथ कई कहानियां अवश्य जोड़ गया।

दोनों रात के एक बजे तक लॉन में बैठे अपने मन खोलते रहे।

“सच आदित्य, तुम तो लाश के साथ जीने का धर्म निभा रहे हो, सचमुच प्रशंसा के पात्र हो।” मैडम की मुद्रा एकदम भीगी घास जैसी नरम थी।

“पर आप भी कितनी सशक्त बहादुर महिला हैं, लोगों को आपके इस साफ़-सुथरे मन तक पहुंचने के लिए स्वयं की कलुषिता धोनी पड़ेगी।” आदित्य गम्भीर था।

“लोग? या हमारे आसपास जीने वाले कुण्ठित मनोवृत्तियों के ये बुद्धिजीवी?” – प्रिया का ठहाका खोखला था।

“है तो कुछ ऐसा ही! ये लोग समझते हैं कि जो अपने पति या पत्नी के साथ ख़ुशहाल जीते हैं या जीने का नाटक रचाये हैं, वे ही सही नैतिकता की परिभाषाएँ रच सकते हैं।”

“कहना शायद असंगत नहीं, परन्तु इनमें से सभी एकान्त में मेरे प्रति आकर्षण जता चुके हैं।”

“मैं जानता हूँ! अभी दो-चार दिन पूर्व ही एक योग्य पति मुझसे पूछ रहे थे कि कोई मन बहलाने के लिए यहां औरत नहीं मिल सकती। ग़ुस्सा तो चढ़ा था कि यह प्रश्न मुझसे क्यों पूछा गया? क्या अकेले रहने का यही अर्थ होता है?”

“ले आओ नीलिमा को! मेरे लिए कभी-कभार घर का खाना खाने की जगह हो जायेगी। न हो तो यहीं रह जाना कुछ दिन।” प्रिया भावुक हो गयीं।

प्रिया व आदित्य एकदम बिना किसी काम्पलैक्स के साथ हो गये और हंसते हुए चलने लगे।

परन्तु उनकी यह सामान्य चाल अन्यों को हज़म नहीं हुई! स्टाफ़ रूम में यदि प्रिया कभी रजिस्टर भी रखने जाती तो उसके आसपास ठिठोलियां कांटों की तरह बिखेर दी जातीं।

“नयी उम्र के लड़के की चिकनाई पर वह बुरी तरह मुग्ध हो गयी है, दोनों भ्रष्ट हैं।”

धीरे-धीरे पीठ पर भौंकते-भौंकते वे सब मुंह पर भी भौंकने लगे। प्रिया की भरी आंखें ताक आदित्य दहाड़ा था— “जिन्हें लालीपॉप खाने को नहीं मिलती वह उसे कहीं सुरक्षित रखा हुआ भी नहीं देख पाते। आप क्यों किसी ग़लत लांछन के लिए रोती हैं। सारा शहर भी चीख़े तो मैं आपके प्रति अपनी अच्छी मान्यता नहीं तोड़ सकता। चलिए, आपका मूड ठीक करने किसी मूवी में बैठा जाये।”

वे दोनों मूवी में आ गये।

मैडम प्रिया के ठहाके पुनः गूंज उठे। इण्टरवल में वहां श्री व श्रीमती पाठक भी थे। उन दोनों को साथ देख इस तरह चौंके जैसे भूत-भूतनी देख लिये हों।

“बेचारे कहीं गश न खा जायें मेरी जैसी बेशरम औरत को देखकर”। प्रिया ने और ज़ोर-से ठहाका लगाया।

ठिगने पाठकजी से रहा नहीं गया, उन्होंने ज़ोर से कह ही दिया- “अरे देखना, कल का लौंडा है, खा-पीकर लात लगा चला जायेगा, तब ठहाकों का क्या होगा?”

आदित्य की आंखें ख़ूँख़ार हो गयीं परन्तु प्रिया ने आहिस्ता से उसका हाथ दबा रोक लिया, “हम इस पर प्रतिक्रिया ही क्यों व्यक्त करें? इस प्रतिक्रिया का अर्थ होगा कि उस रिमार्क को हमने स्वीकारा है।”

विरोधों के बावजूद भी वे दोनों एक-दूसरे के निजी दुःख-सुख के सच्चे साथी बने रहे!

प्रिया आदित्य के भोजन से ले उसके कपड़ों तक की चिन्ता करतीं और आदित्य उनके घर की सब्जी तक लाने से कतराता नहीं।

अचानक आदित्य एक पूरे दिन गुम रहा। प्रिया चिन्तित-सी गुलाब के पौधों में पानी दे रही थीं। शाम का भीगापन चमेली की ख़ुशबू के बीच महक रहा था।
आदित्य आ गया । वह बहुत टूटा व भरभराया-सा लग रहा था।

“क्या बात है? बहुत थक गये हो? ठण्डी लस्सी लाती हूँ।” प्रिया ने सहजता से आदित्य का माथा छूकर कहा।

“अभी तो ठण्डी-गरम दोनों लस्सी ले आओ!”

“क्यों, क्या तबियत ठीक नहीं लग रही?” प्रिया ने आदित्य का हाथ भी छुआ।

“मत छूओ मुझे!” आदित्य चिंहुका।

आश्चर्यचकित अपमानित-सी प्रिया ठिठकी रही। सदा की तरह सन्तुलित हो पूछा- “क्या हुआ आदित्य? मुझसे क्यों बच रहे हो?”

“मैं तो आपके सामने ढोंग नहीं रचा रहा लेकिन?” – आदित्य लगभग रो उठा।

प्रिया ने पास आ अपना निश्छल स्नेह-भरा हाथ आदित्य के कन्धे पर रखा और वह उस पर अपना सिर रख सिसक उठा। कुछ देर बाद भीनी-भीनी हवा के ठण्डे झोंकों ने उसे स्थिर किया और उसने नीलिमा का पत्र प्रिया को थमाया।

पत्र में लिखा था कि नीलिमा को उनके महाविद्यालय वालों के कई गुमनाम पत्र प्राप्त हुए हैं जिनसे उसे पता लगा है कि आदित्य और प्रिया के सन्दिग्ध सम्बन्ध हैं। इसीलिए आदित्य ने अभी तक नीलिमा के पास लौटने के लिए स्थानान्तर का प्रयत्न नहीं किया! नीलिमा आदित्य की इस आवारागर्दी को अब सहन नहीं करेगी। या तो वह प्रिया से मिलना-जुलना छोड़ तुरन्त वापस लम्बी छुट्टी ले आये या तलाक के लिए सहमति भेज दे।

“इसमें इतनी परेशानी क्यों? अपने बुद्धिजीवियों से और क्या उम्मीद की जा सकती थी? नीलिमा तो सामान्य स्त्री की ही भांति लिख रही है।”

“केवल लिखती तो ही ठीक था, उसने अपने पिता को मुझसे लड़ने के लिए भेज दिया है। बिना सोचे-समझे वह जो मन में आया कहते रहे हैं। मैं बार-बार समझा चुका पर वे यही कहते हैं तो तुम क्यों मैडम प्रिया के घर जाते हो—अब तो तुम्हें इसी समय वापस चलना पड़ेगा। बड़ी कठिनाई से छुटकर आ पाया हूँ।”

“तो क्या तुमने सदा के लिए वापस जाने का निर्णय ले लिया है?” प्रिया की आवाज़ काँप रही थी।

“मैं अब निर्णय लेने के लिए स्वतन्त्र कहां हूँ? मेरे टिकिट तक ले लिये गये हैं! इच्छा तो होती है कि नीलिमा को छोड़ ही दूँ, जो ऐसी बुद्धिहीनता का परिचय दे गुमनाम पत्रों को प्रोत्साहित करती है।”

“नहीं, ऐसा मत सोचो! परिवार बहुत क़ीमती है! ठीक है… लौट जाओ!” प्रिया की आंखें भर आयीं। उनका ख़ालीपन बहुत अरसे बाद आंसू भी ढांक नहीं पा रहे थे।

“मैं जानता हूँ मैडम! आप कितनी अकेली हैं।”

“परन्तु जानकर भी क्या करोगे? हम ऐसे लोगों के सामने क्यों असहाय हो जाते हैं जिन्हें हमारे निर्दोष सुखी जीवन से भी जलन होती है।”

“मैं ऐसे लोगों से नहीं डरता परन्तु आपके अपमान से डरता हूँ! ये पत्र बन्द नहीं होंगे, इनका कपट चलेगा और बेवक़ूफ़ नीलिमा कुछ भी कर सकती है।”

“लस्सी ले आऊं?” प्रिया ने सामान्य होना चाहा ।

“वे सब यहीं कहीं मंडरा रहे होंगे, सूंघते हुए यहां तक आयें इसके पहले ही।” आदित्य बहुत अस्थिर हो उठा।

“अच्छा! जाना चाहते हो जाओ!” प्रिया की आवाज़ ठण्डी थी।

“तो चलूं?”

प्रिया एकदम ख़ाली पात्र सी जाते हुए आदित्य को ताकती उन गुमनाम पत्रों की बात सोच त्रस्त हो उठी… और वह समझ गई कि अभी पता नहीं कब तक ऐसी त्रस्तता का बोझा उसे ढोना पड़ेगा। शायद तब तक जब तक समाज नर-नारी के सहज रिश्तों को सही मान्यता नहीं दे देता।

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