खून का सवाल

मैं अभी भी निषेधित मानव हूँ
साँस मेरी बहिष्कृत है
मेरी कटि को ताड़ के पत्तों से लपेटकर
मेरे मुँह पर उगलदान लटकाकर
लोगों के बीच मुझे
असह्य मानव-पशु बनाने वाले मनु ने
जब मेरे काले माथे पर जबर्दस्ती से
निषेध का ठप्पा लगाया था
तभी मेरी समस्त जाति की
शनैः शनैः हत्या कर दी गई
अब नया क्या मरना?
यदि हमारी रहस्यमय मौतों को लिखा जाय
तो हमारी हत्याएँ ही पत्रिकाओं की
सनसनीखेज सुर्खियाँ बनेंगीं
इस देश में कहीं भी खोदकर देखा जाय
तो हमारे कंकाल मिट्टी के कंठ से दिखेंगे।

वेद सुने जाने पर मेरे कानों में जब सीसा भर दिया गया था
जब कोई भाषा बोलने पर मेरी जुबान काट ली गई थी
किसी की काम-वासना को शमित करने पर
जब मेरा सिर काट लिया गया था
पेड़ से बांधकर पशु-सा मुझे मारा गया था
मैं तभी लाश बन गया था
पर हमारी लाशें कोई खबर नहीं बन सकीं

शास्त्रों के नाम बदल गये हैं
अंकों की संख्याएँ बदल गयी हैं
सिर्फ हमारी हत्याएँ ही नहीं बदली हैं
अब हमारी लाशें कोई सनसनीखेज खबर नहीं है हमारे लिए

नयी नहीं है लाशों पर हत्यारों की सहानुभूति
नये नहीं हैं जुलूसों में राजनीतिक दलों के आँसू
कल के इतिहास ने केवल अँगूठा ही काटा था
वर्तमान तो पाँचों अंगुलियाँ काट रहा है

सरेआम गुप्त रूप से
घट-सर्प हमारी छायाओं का
पीछा कर रहा है
शृंखलाओं में सीधा खड़ा/दृश्य
यह दृश्य एक चौराहा है
बीसवीं शताब्दी के लिए भी खून का सवाल ही है
उगी हमारी छाती की ओर बढ़ता आ रहा है खाण्डा

संविधान लिखने की विरासत में
मिल रहे हैं – जेल
शृंखलाएँ मरण के पुरस्कार
हमारे बीच के व्यर्थ पौधे
हमारी हरित साँस को दबा रहे हैं
हमारी मृत्यु का भी मूल्य निर्धारित किया जा रहा है

अब हमें खून की रकम नहीं चाहिए
हमें चाहिए हमारी चाह व्यक्त करने वाला
निर्भीक कंठ
नया संविधान
नया देश
नयी धरती
नया आकाश!!