खो जाता हूँ काशी में,
साधु और सन्यासी में,
गंगा के उन घाटों में,
रेतों के उकरे पाटों में,
पहलवान की लस्सी में,
और घाट बनारस अस्सी में,
मालवीय जी के बाग़ में,
बिस्मिल्ला खाँ के राग में,
उन संकरी सी गलियों में,
मस्ती और रंगरलियों में,
पावन सी उस गंगा में,
मल्लाह मस्त मलँगा में,
दशाश्वमेध की शाम में,
राजा लँगड़ा आम में,
नई सड़क की भीड़ में,
रविदास जी के सीर में,
जलेबी और कचौड़ी में.
लौंगलत्ता और पकौड़ी में,
लंका बेचू की ऑटो में,
बी.एच.यू. गेट की जगती रातों में,
संकटमोचन की शांति में,
काशीमुख के उस कांति में,
का गुरु के भौकाल में,
अड़ी पे लगी चौपाल में,
भांग की भरी गगरी में,
विश्वनाथ की नगरी में,
खो जाता हूँ काशी में,
साधु और सन्यासी में।।

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अभिषेक द्विवेदी
आधा अधूरा लेखक ✒️

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