यह नहीं कि, कभी कोई ख्वाब नहीं हुए हैं पूरे।
फिर भी कहीं न कहीं, अभी भी रहते हैं अधूरे।
अंग-संग तेरे चलते चलें, चाहे अलग हो मुकाम।
तेरे सौंधे साए में बीते, मेरी हर सुबह और शाम।
बस यूँ ही मेरे हाथों में रहें, तेरे मखमली हाथ।
बस यूँ ही मिलता रहे, तेरे मजबूत काँधे का साथ।
फिर देखूं अपनी जीत तैरती मैं तेरी आँखों में।
फिर मिलूं मैं खुद के खुदा से बस तेरी पनाहों में।
अपने अहसासों को सदा एक होते हुए ही देखूं।
अपने ख्वाबों संग सदा यूँ ही तुझे छू कर देखूं।

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