हवा को जितना जानता है पानी
कोई नहीं जानता

पानी को जितना जानती है आग
कोई नहीं जानता

आग को जितना जानते हैं पेड़
कोई नहीं जानता

पेड़ को जितना जानती है मिट्टी
कोई नहीं जानता

मिट्टी को जितना जानता है किसान
कोई नहीं जानता

किसान को कौन जानता है?

कोई नहीं जानता

कोई नहीं जानता कि
कब बरसे थे उसकी मिट्टी जैसी देह पर मेघ
कोई नहीं जानता कि कब खिला था उसका चेहरा कपास के फूल की तरह
कब हुई थी उसकी रेतीली, खुरदरी त्वचा सुनहरी
गेहूँ की पकी हुई बालियों की तरह

थोड़ा-थोड़ा सब जानते हैं

बेटा जानता है कि उसके पिता को अब नींद नहीं आती
बेटी जानती है कि उसके पिता के चेहरे पर टूटती हुई दीवार जैसी दरारें आ गई हैं
पत्नी जानती है अब उन्हें भूख नहीं लगती

“किसान का पेट लक्कड़बग्घे का पेट नहीं है
किसान लक्कड़बग्घों की रोटी है!”
वह चीते की तरह मेहनत करता है और लक्कड़बग्घों का पेट भरता है

साहूकार जानता है कि दो रुपये सैकड़ा साधारण और उसके बाद चक्रवृद्धि ब्याज के हिसाब से उस पर कितना क़र्ज़ा है
सरकार जानती है कि केसीसी के दो लाख माफ़ करने से वह उनके वोट बैंक में शामिल हो सकता है

पूरा कोई नहीं जानता
लेकिन एक दिन जानेंगे

जानेगी हवा
कि जितनी थी उसके पसीने की गंध
उससे ज़्यादा थी उसके भीतर फूलों की ख़ुशबू

पेड़ जानेगा
जितना हल्का था उसका शरीर
उतनी हल्की नहीं थी उसकी जान

पानी जानेगा
जितने मैले थे उसके कपड़े
उससे पवित्र थी उसकी अस्थियाँ

आग जानेगी
जितना बहता था उसका पसीना
भीतर से उतना ही था सूखा
सूखी लकड़ी की तरह
धधक-धधककर जलने वाला

मिट्टी जानेगी
जितनी खुरदरी थी उसकी फटी बिवाइयाँ
उतना ही नर्म मुलायम था उनका स्पर्श

जितना ग़ुस्सैला था उसका स्वभाव
उतनी ही ठण्डी है उसकी राख…

शालिनी सिंह की कविता 'मेरे पुरखे किसान थे'

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