किसी से इश़्क करना चाहिए था
मुझे हद से गुज़रना चाहिए था

वो आँखों में उतरकर रह गया है
जिसे दिल में उतरना चाहिए था

मुहब्बत पाके भी तुम ख़ुश नहीं हो
तुम्हें तो डूब मरना चाहिए था

ये क्या पहली दफ़ा में भर ली हामी
ज़रा-सा तो मुकरना चाहिए था

हमें तन्हाई रास आने लगी है
तुम्हारा साथ वरना चाहिए था

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विजय राही
विजय राही पेशे से सरकारी शिक्षक है। कुछ कविताएँ हंस, मधुमती, दैनिक भास्कर, राजस्थान पत्रिका, डेली न्यूज, राष्ट्रदूत में प्रकाशित। सम्मान- दैनिक भास्कर युवा प्रतिभा खोज प्रोत्साहन पुरस्कार-2018, क़लमकार द्वितीय राष्ट्रीय पुरस्कार (कविता श्रेणी)-2019

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