कितना वक़्त लगाया तूने आने में
उलझे मन के धागों को सुलझाने में
कुछ छोटी सी बातों को ठुकराने में
एक ज़रा सी बात पे रूठे इस दिल को
इतना वक़्त है लगता क्या समझाने में

एक दिया मेरे अंतस का अब भी है
जो कि तेरी सिम्त में जाकर बैठा है
भूला भटका तो आएगा तू आख़िर
कबसे जाने आस लगाकर बैठा है

कितने मौसम बैठे हैं तेरी जानिब
वो भी तेरे आने की ख़्वाहिश में हैं
सारे रस्ते इसी तरफ मुड़ बैठे हैं
तुझको मुझ तक लाने की साज़िश में हैं

इन पेड़ों के पत्तों ने भी पेड़ों पर
ख़ुद को जाने कबसे थाम के रक्खा है
कब से वही सुहानी खूशबू को पाले
गुलशन ने फूलों को बांध के रक्खा है

दरिया भी अब धीमे-धीमे बहता है
ताकि तू अपने पैरों को धो पाए
सागर कबसे मोती बनकर बैठा है
जाने कब फिर आँख से तेरी रो पाए

रेशम के कीड़े तुझसे वाबस्ता हैं
वो भी तेरी आस लगाए बैठे हैं
तेरी खुश्बू उनको नहीं मयस्सर है
तो फिर आख़िर रेशम कैसे बन पाए

पेड़, हवा, गुलशन और ये पूरा मौसम
कबसे हम सब वक़्त को थामे बैठे हैं
एक दिया है जो कि बस बुझ बैठा है
कितना वक़्त लगाया तूने आने में…

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