उम्मीद की तुरपाई को
हर बार ही हक़ीक़त ने उधेड़ दिया
जब भी उसने स्वप्न बुनना चाहा
सलाई की नोक को
उसकी नींद की आँखों में कोंच दिया गया

कभी वो किसी नदी किनारे
तो कभी किसी ऊँची इमारत पर खड़ी हो
कच्चे घड़े को डुबो या फेंक देना चाहती थी,
अपने अन्दर की अधमरी गौरैया को
उड़ा देना चाहती थी दुःख की गुफा से बाहर लेकिन

उसे लौटना होता
जैसे उसका कोई अनुबंध था
पहाड़ी चुभन से
उस गाँठ से जिससे उसने जने थे बच्चे

एक रत्ती दुरवस्था के
अदीन होने की उम्मीद न होना
और संग जीने को मजबूर रहना
लात-घूँसे, थपेड़ और डंडे खाने के बाद भी— जैसे
बँधे रहना उस खूँटे में
जिसका क्रूर ग्वाल
थान की चारों छिम्मियाँ ऐंठ कर
गोरस की जगह ख़ून निकाल पीता हो

और गाय टूवर आँखों से
अपने बच्चे का मुँह ताकती हो
पगहे को दाँत से काटकर
भाग जाने का विकल्प होने के बावजूद भी।

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