कुछ नहीं कहा मैंने उसे
समेट सहेज रख लिया
स्वयं में ही
पर निहारती रही उसे
अनवरत
पीती गईं उसके चेहरे का तेज
मेरी आँखें।

मेरी कोशिकायें अकड़ जकड़
शिथिल हों शान्त हो गईं
ठहर गया सबकुछ
अन्दर ही अन्दर
उसकी आँखों ने कुछ कहा था शायद
क्या भाँप गया था वह भी!

शब्द ख़त्म हो गये थे
आँखें जड़ थीं, मुग्ध।
वो झुका
पूजा के दो फूल मेरी हथेली पे रख
मठ के किसी अन्तरकक्ष में घुल गया।

हाँ
समेट लिया था उसने भी
स्वयं को
मैं मरीचिका थी उसकी
दुर्लभ निषिद्ध वर्जित।

उस साल
वसन्त
उन दो फूलों में भर गया।

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