कुछ स्त्रियाँ

‘Kuchh Striyaan’, a poem by Kavita Nagar

आज की स्त्रियाँ रचती रहती हैं
स्वयंवर अपने इर्द-गिर्द
और चुनती हैं मन का राजकुमार।
उम्मीदें रखती हैं ख़ुद से
वर को पहनाती है,
चुनौतियों का वरमाल।
क़दम से क़दम मिलाने
का रखती हैं हुनर।

इनकी ख़्वाहिशों की टापें,
अक्सर गूँजती हैं दूर तलक।
नहीं क़ैद रखती हैं अपनी
इच्छाओं को मन के अस्तबल में।
बस इतना जानती हैं कि
लगाम लगाना कहाँ पर ज़रूरी है।

बिना किसी सिंदूरी लक्ष्मण रेखा लिए
भी जानती है अपनी सीमाएँ, और
इनके मन पर सदा रहती है
सिंदूरी छाप, और गहरा गाढ़ा प्रेम।
सर पर नहीं रखती पर
मन पर पल्लू रखकर
निभाती जाती हैं,
ससुराल के फ़र्ज़
बनती हैं सास-ससुर के
बुढ़ापे की लाठी।

कुछ स्त्रियाँ चुनौतियों को भी
देती हैं चुनौती,
खड़ी रहती हैं दूब-सी
परेशानियों की बाढ़ के वक़्त,
अपनी मौलिकता और दृढ़ता लिए।

बीते लम्हों की कसक,
नहीं ढोती हैं सालों तक।
बुरी यादों को छिड़कती हैं
चिली फ़्लेक्स की तरह
वर्तमान के पलों पर,
और ले लेती है ज़ायका ज़िन्दगी का।

कुछ स्त्रियाँ नहीं ओढ़तीं
गुलाबी रंगत ताउम्र।
खिलती हैं अपराजिता-सी
लेकर नीला रंग
और पोसती हैं
अपनों के सपनों की वंशबेल।

हर सदी में होती ही है
कुछ ना कुछ स्त्रियाँ
जो गढ़ती हैं,
अपने पैमाने, अपना आयाम,
पंखों का करती है निर्माण,
और छूती हैं अपना आसमान।

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