मेरे अंदर एक पागलखाना है

मेरे अंदर एक पागलखाना है
तरह-तरह के पागल हैं

एक पागल हरदम बोलता ही रहता है,
दूसरा पागल ख़ामोशी ओढ़े है
बस नींद में कुछ बुदबुदाता है

एक पागल को छोड़ गई उसकी माशूक़ा
नज़्म लिखता है, ग़ज़ल गुनगुनाता है
पागल है, पागलों को सुनाता है

एक ख़ुशमिज़ाज पागल है
हँसता है, महफिलें जमाता है

कल पागलखाने में,
एक नया पागल दाखिल हुआ
वो भी बड़ा पागल है
क्रांति-क्रांति चिल्लाता है
सोने ही नहीं देता
मैंने बीती रात उससे पूछा,
“क्रांति आ गई तो क्या करोगे?”
कहने लगा पागल
बाहों में भर के चूमेगा..

एक बनावटी आदमी

मैं एक बनावटी आदमी हूँ
मेरी शक्ल बनावटी के ‘ब’ से मिलती है
मैंने तबियत से फेंके हैं आसमान में पत्थर
और नहीं हुआ है कोई सुराख़

मेरा इश्क़ एक चोचला है
कभी नहीं किया उतना इश्क़
जितना मैंने लिखा है
ये आलिंगन, ये चुम्बन, ये आँसू, ये दर्द
सब फ़र्ज़ी हैं

मैं एक बनावटी आदमी हूँ
मेरी उँगलियाँ बनावटी के ‘न’ से मिलती हैं
मेरी कविता लफ्फाजी है
मेरा गीत मामूली तुकबंदी है

भौंहों के गिरने-उठने से लेकर
आंखों के चौड़ा होने तक
मेरे सारे हाव-भाव नकली हैं

मैं एक बनावटी आदमी हूँ
मेरे कूल्हे बनावटी के ‘ट’ से मिलते हैं
मैं जो तन के चलता हूँ
कई बार राह चलते औंधे मुँह गिरा हूँ
फिर खिसियाई-सी सूरत लिए उठा हूँ

मैं एक बनावटी आदमी हूँ
मेरी शक्ल बनावटी के ‘ब’ से मिलती है..

सुबह

सूरज के निकलने से पहले ही
खुल जाती है सुबह
जैसे, तुम जाग जाती हो
रोज़ाना
मेरे जगने के चंद मिनट पहले
किन्तु, आँखे खोले पड़ी रहती हो
कुछ देर बिस्तर पर ही
जैसे, चाँद पड़ा रहता है
सुबह के खुलने के बाद भी
काफी देर आसमान में ही
और
करता है सूरज के आने का इंतज़ार
सुबह के खुलते ही
शुरू होता है
इंसानी क़ौम का
अनवरत चलने वाला इंतज़ार

सुबह के खुलते ही
गुलाबों से भी गुलाबी तुम्हारे होंठ
और उनके ऊपर चस्पा स्याह तिल
उकसाते हैं
तुम्हें दोबारा रात जैसे
चूम लेने के लिए
सुबह के खुलते ही
प्रगाढ़ होने लगता है
हमारा प्रेम

सुबह के खुलते ही
पंछी घोंसलों से बाहर आ
लगते हैं चहचहाने;
हो जाते हैं दर-बदर
दाने की फ़िराक़ में,
बाज़ माँस की तलाश में
पहाड़ों से मैदानों का रुख़ करते हैं
और,
माएँ बड़ी तरतीब से रखती हैं
कण्डियां, लकड़ियाँ
चूल्हों पर
ताकि, जल सके चूल्हा
गर्म हो सके कलेवा
सुबह के खुलते ही
खुल जाती है भूख, एकाएक

सुबह के खुलते ही
मच्छर देते हैं आख़िरी चुम्बन
और चूस लेते हैं
ख़ून का वो क़तरा
जिसे वो अपना समझते हैं;
फिर चले जाते हैं
करने रात भर की नींद पूरी
किसी नाले, तलाब या भुसौरे में
जैसे, ‘सरकार’ चूस महसूल
करने लगते हैं विदेशी दौरे

मात्र सौ रुपये प्रतिमाह,
के दाम पर
अख़बार वाला पहुँचा जाता है अख़बार
दहशत, मातम, मायूसी
के हज़ारों नश्तर लिए
आता है अख़बार
सुबह के खुलते ही
आदमी होने लगता है
आदमी के सामने नँगा।

नए मज़दूर से नहीं सम्भली
अंग्रेज़ी शराब
सड़क पर ही चैन से
सोता रहा रात-भर;
अपार्टमेंट के चौकीदार ने
उसे बड़े अधिकार से जगाया
सुबह के खुलते ही
ज़्यादा नहीं, थोड़ा सा ही
खुल जाता है
हरेक आदमी

गली के कुत्ते भौंकने लगते हैं
पड़ोसी के लेब्राडॉर से
कई गुना भारी आवाज़ में
सुबह के खुलते ही
शुरू हो जाती है
खुद को औरों से
बेहतर साबित करने की कवायद

सुबह के खुलते ही
एक बार फिर
हमेशा के लिए
सच हो जाता है
डार्विन का सिद्धांत।

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कुशाग्र अद्वैत
कुशाग्र अद्वैत बनारस में रहते हैं, इक्कीस बरस के हैं, कविताएँ लिखते हैं। इतिहास, मिथक और सिनेेमा में विशेष रुचि रखते हैं।अभी बनारस हिन्दू विश्विद्यालय से राजनीति विज्ञान में ऑनर्स कर रहे हैं।

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