चकमक, दिसम्बर 2020 अंक से

‘क्यों क्यों’ में इस बार का हमारा सवाल था— “गोल चीज़ें लुढ़कती क्यों हैं?”

कई बच्चों में हमें दिलचस्प जवाब भेजे हैं। इनमें से कुछ तुम यहाँ पढ़ सकते हो। तुम्हारा मन करे तो तुम भी हमें अपने जवाब लिख भेजना। अगली बार में लिए सवाल है— “क्या देवों-राक्षसों की कहानियाँ सच्ची हैं या नहीं? और तुम्हें ऐसा क्यों लगता है?”

“जिसका नाम ही गोल हो, वह चीज़ गोल-गोल नहीं घूमेगी!”

—अनुभव चमोली, पाँचवीं, केन्द्रीय विद्यालय, पौड़ी, उत्तराखण्ड

 

“गोल चीज़ के कई पैर होते हैं। वे अन्दर दौड़ते हैं तो गोल चीज़ लुढ़कने लगती है।”

—मृगॉंक चमोली, तीसरी, केन्द्रीय विद्यालय, पौड़ी, उत्तराखण्ड

 

“गोल चीज़ें इसलिए लुढ़कती हैं क्योंकि वो नीचे से गोल होती हैं। उनकी चार भुजा नहीं होती इसलिए लुढ़कती हैं।”

—राहुल नेगी, पाँचवीं, एसडीएमसी स्कूल, हॉज़ खास, दिल्ली

 

“अब बेचारा कोई-सा भी गोल शेप हो, उसको क्या पता कि उसको लुढ़कना है। और कोई नहीं चाहता कि वो लुढ़के। तो हम पुलिस को बोलकर हरेक पत्थर के लुढ़कने पर जुर्माना लगा देते।”

—गीत रेकवाल, चौथी, देवास, मध्य प्रदेश

 

“गोल चीज़ इसलिए लुढ़कती है क्योंकि उसमें कोई भी किनारा नहीं होता। और उसे ढलान मिलते ही वो लुढ़कने लगती है।”

—सुरभि, आठवीं, सेंट मैरी कॉन्वेंट स्कूल, देवास, मध्य प्रदेश

 

“गोल चीज़ों में ब्रेक नहीं होता और वो ज़मीन पर बैलेंस नहीं बना पाती हैं। क्योंकि वो गोल-मटोल होती है।”

—हर्षिता कोशले, दसवीं, केन्द्रीय विद्यालय, देवास, मध्य प्रदेश

 

“गोल चीज़ों के हाथ-पैर नहीं होते। उनमें बैलेंस नाम की चीज़ नहीं होती और उनके दिमाग़ भी नहीं होता। इसलिए वह लुढ़क जाती हैं।”

—हनी बौरासी, ग्यारहवीं, उत्कृष्ट विद्यालय, देवास, मध्य प्रदेश

 

“ना पैर, ना कोना, ना आता उसे सीधे बैठना। इसलिए गोल चीज़ें लुढ़कती हैं।”

—सन्तुष्टि बावस्कर, आठवीं, केन्द्रीय विद्यालय, देवास, मध्य प्रदेश

 

“कोई चीज़ गोल रहती है तो वह लुढ़कती है। किसी चीज़ में घल (टकराना) जाती हैं तो रुक नहीं पाती, हिरा (गुम जाना) जाती हैं। जब कंचा खेलते हैं तो वह भी लुढ़कता है। मेरे आँगन में अमरूद का पेड़ है। एक दिन अमरूद गिरा और लुढ़ककर नाली के पास पहुँच गया क्योंकि वह भी गोल है।”

—रीना यादव, पॉंचवीं, शासकीय प्राथमिक विद्यालय बडतूमा, सागर, मध्य प्रदेश

 

“गोल चीज़ों का सर्पोट नहीं होता। इसलिए वह लुढ़क जाती हैं।”

—रितु, पॉंचवीं, प्रोत्साहन इंडिया फाउण्डेशन, दिल्ली

 

“क्योंकि उनके नीचे का हिस्सा फिसलने वाला होता है।”

—चैतन्य वैध, सातवीं, मंज़िल संस्था, दिल्ली

 

“क्योंकि गोल चीज़ों का आकार घुमावदार होता है।”

—जगदीश, सातवीं, अज़ीम प्रेमजी स्कूल, मातली, उत्तरकाशी, उत्तराखण्ड

 

“क्योंकि उनकी गोल आकृति होती है और गोल चीज़ों में कोई कोण नहीं होता है। किसी गोल चीज़ में रबड़ लगाया जाता है तो वो लुढ़कती भी है और टप्पा भी खाती है। अगर हम कपड़े की गेंद बनाऍं तो वो ना लुढ़कती है, ना टप्पा खाती है।”

—प्रतिक्षा, पॉंचवीं, अज़ीम प्रेमजी स्कूल, मातली, उत्तराकाशी, उत्तराखण्ड

 

“गोल चीज़ के ऊपर और नीचे का सिरा थोड़ा भारी होता है। और अन्दर का खोखला होता है। जब वह ऊपर की ओर से आगे जाती है तो नीचे का भारी सिरा ऊपर आ जाता है। फिर वह आगे जाता है। यह प्रक्रिया जारी रहती है।”

—शीतल, सातवीं, अज़ीम प्रेमजी स्कूल, मातली, उत्तरकाशी, उत्तराखण्ड

 

“गोल चीज़ें इसलिए लुढ़कती हैं क्योंकि वो हल्की होती हैं।”

—आशु राणा, चौथी, अज़ीम प्रेमजी स्कूल, मातली, उत्तरकाशी, उत्तराखण्ड

 

“क्योंकि उनमें घर्षण कम होता है। जो चीज़ जितनी गोल या घर्षण-रहित होगी वह उतना ज़्यादा लुढ़केगी। यही कारण है कि गाड़ियों के पहिए गोल बनाए जाते हैं। जिसके कारण वे कम घर्षण में अधिक दूर तक जाते हैं। वे सभी चीज़ें गोल या चिकनाई युक्त बनायी जाती हैं जिन्हें एक स्थान से दूसरे स्थान स्थानान्तरित करना होता है या उनके द्वारा स्थानान्तरित किया जाता है।”

—जिया गोयल, सातवीं, वेदान्त अकादमी, मनावर, धार, मध्य प्रदेश

 

“क्योंकि गोल चीज़ें एक जगह नहीं रह सकतीं। उनका निचला वाला हिस्सा वृत्ताकार होने की वजह से वो एक जगह ठहरती नहीं हैं। गोल चीज़ों के पेंदें गोल होने के कारण वह लुढ़कती हैं।”

—ज्योति बोथरा, तीसरी, रॉयल कॉन्कॉर्ड इंटरनेशनल स्कूल, बेंगलूरु, कर्नाटका

 

“क्योंकि गोल चीज़ों का ना कोई कोना होता है, ना छोर जो उन्हें लुढ़कने से रोके।”

—अनाया डोगरा, तीसरी, द हेरिटेज स्कूल, वसन्त कुंज, दिल्ली

 

“मैं हूँ अनोखा, मैं हूँ मस्त
मेरा नाम है गोल
लुढ़कता रहता हर जगह
नहीं ठहरता मैं पानी की तरह
नहीं पसन्द मुझे बैठना
वर्ग, आयत, त्रिभुज की तरह नहीं मुझे बनना
अलग रूप मेरा, एक जगह नहीं बैठना
चाहता हूँ मैं दुनिया घूमना
इसलिए तुम पाओगे मुझे हमेशा लुढ़कते हुए!”

—तिशा, तीसरी, द हेरिटेज स्कूल, वसन्त कुंज, दिल्ली

 

‘चकमक’ के दिसम्बर 2020 अंक से साभार। ‘चकमक’ का सब्सक्रिप्शन इस लिंक से लिया जा सकता है।