अभी-अभी लाउडस्पीकर पर बताया गया है कि गाड़ी लगभग दो घंटे लेट हो जाएगी। पास ही खड़े एक सैनिक अफ़सर ने बताया कि रास्‍ते में बड़े-बड़े स्‍टेशनों पर जनता इन लोगों के स्‍वागत के लिए इकट्ठा हो गई है। इसलिए यहाँ पहुँचते-पहुँचते इतनी देर हो जाना तो नेचुरल है। उसे इस बात से कोई परेशानी नहीं हुई। गाड़ी चाहे जितनी लेट हो जाए, उसे क्‍या? जिसने आना है, वह इस गाड़ी में तो है ही नहीं। उसने स्‍वेटर बुनना बंद कर दिया, फिर उसे प्‍लास्टिक के लिफ़ाफ़े में डाल दिया। जनवरी की निर्दय, क्रूर हवा बेरोक-टोक चल रही है। इतनी सारी भीड़ ने कई काग़ज़, ख़ाली लिफ़ाफ़े, प्‍लेटफ़ॉर्म पर फेंक दिए हैं। हवा इन्‍हें बड़े नियमित तरीक़े से एक से दूसरी ओर उड़ाए लिए जा रही है। आगे-आगे दौड़ते हुए काग़ज़ और सिर धुनते लिफ़ाफ़े और उनके पीछे लगी जनवरी की निर्दय क्रूर हवा। सेनावालों ने प्‍लेटफ़ॉर्म के सिरे पर काफ़ी लम्बा-चौड़ा शामियाना लगाया हुआ है। लोगों को मुफ़्त चाय और बच्‍चों को खाने की छोटी-मोटी चीज़ें बँट रही हैं। वह इतनी देर से अकेली खड़ी है। सब आते-जाते उसे देखते हैं, पल भर थमते हैं, सोचते हैं—उससे बात करें, उसकी आँखों में बात करने का कोई संकेत नहीं मिलता, फिर चेहरों पर सहानुभूति बिछलाते हुए आगे बढ़ जाते हैं। वह सोचती है—क्‍या उसे उत्‍सुक होने के, ख़ुश दिखने के भाव चेहरे पर लाने चाहिए? फिर मन के अंदर जो सत्‍य है, सत्‍य का ज्ञान है, वह बरजता है, समझाता है—ऐसा मत करो। अब यहाँ कोई नहीं आएगा।

उसे लगता है, पास आकर कोई ठहर गया है। दो छोटी-सी लड़कियाँ उसके पास आकर थम गई हैं। दोनों ने सिर पर लाल रंग की, ऊन की बनी टोपियाँ पहन रखी हैं। ठंडी हवा लगने की वजह से उनके चेहरे बहुत लाल दिखायी दे रहे हैं। दोनों उसे देख रही हैं। वह जवाब में मुस्‍करा तक नहीं सकती। लड़कियाँ थोड़ा डर गई हैं। वे इस बात की अभ्‍यस्‍त दिखती हैं कि जो कोई भी उन्‍हें देखे, वह मुस्कराए, प्‍यार करे। उसे लगता है, दोनों जुड़वा हैं। तभी एक लड़की पॉपकॉर्न का लिफ़ाफ़ा आगे बढ़ाकर, बड़े ठीक ढंग से अंग्रेज़ी में कहती है, “हैव सम।”

पहले वह सोचती है इंकार कर दे, फिर दो लम्बी उँगलियाँ अंदर डालकर, एक दाना निकालकर मुट्ठी में दबा लेती है। लड़कियाँ थोड़ी आश्‍वस्‍त लगती हैं। फिर एक बोलती है, “प्‍लीज़, टेक इट। इट इज़ स्टिल वॉर्म।”

वह मुट्ठी में बंद दाना मुँह में डाल लेती है। इंकार नहीं कर पाती। इन बच्‍चों को क्‍या पता कि जनवरी की हवा बड़ी निर्दय है, उससे क्‍या कुछ कहे जा रही है, साँय-साँय कर के सत्‍य की गेंद को, उसकी ओर उछाले जा रही है। इसे पकड़ो, इसे पकड़ो, यह सच है, और वह थोड़ा-सा परे हट जाती रही है, पिछले एक साल से इस गेंद को पकड़ने से इंकार करती रही है। तभी उन बच्चियों की माँ पास आ जाती है, “आपको ये दोनों परेशान तो नहीं कर रहीं?”

वह सिर हिला देती है। उस औरत के चेहरे से उछल-उछलकर शब्‍द जैसे बिखर रहे हैं, कोई आ रहा है, कोई आ रहा है।

“इनके पिता आ रहे हैं। फ़्लाइट लेफ़्टिनेंट हैं। युद्ध के आख़िरी दिन उनका विमान क्रैश कर गया था। रावलपिंडी के रेलवे यार्ड पर आक्रमण कर रहे थे। रैडक्रासवालों ने मुझे सूचित किया है कि उनकी दोनों टाँगें टूट गई हैं। वैसे ठीक जुड़ गई हैं। पता लगा है, बस थोड़ा-सा लँगड़ा कर चलते हैं।”

वह बात सुनकर आगे बढ़ जाती है। प्‍लेटफ़ॉर्म के एक सिरे पर भीड़ से परे खड़ी हो जाती है। अब उसने फिर से प्‍लास्टिक के लिफ़ाफ़े में से स्‍वेटर निकाल लिया है। वह हवा की विरोधी दिशा में खड़ी है। जनवरी की निर्दय हवा का रेला सत्‍य की गेंद को उछालता हुआ बड़ी तेज़ी से उसकी ओर बढ़ रहा है। कोई नहीं आ रहा, कोई नहीं आ रहा का हाहाकार करती हुई गेंद उसके पास से गुज़र जाना चाहती है। अचानक उसकी आत्‍मा में से दो लम्बे हाथ बाहर निकले, आगे लपके और उन्‍होंने इस गेंद को झपटकर पकड़ ही लिया। हवा उसके पास से गुज़र गई। वह जानती है, अब इसी क्षण, हवा के साथ यह आँखमिचौली का खेल ख़त्म हो गया। उसने हवा को मात दे दी, हरा दिया।

झाड़ियों के पीछे छिपी-बैठी स्‍मृतियाँ उछल-उछलकर बाहर निकल रही हैं, सामने आ रही हैं, अंदर जो जंगल उग आया है, उसमें व्‍याप्‍त जो अंधकार है, उसे लम्बे-लम्बे नाख़ूनों से झाड़ियों से बाहर निकल आए जानवर तहस-नहस कर रहे हैं, फाड़ डाल रहे हैं। और अचानक अँधेरे की बनी खिड़कियाँ, दरवाज़े, रोशनदान हड़बड़ाकर गिर गए हैं, चूर-चूर हो गए हैं। झाड़ियों के पीछे छिपे जानवर इन खिड़कियों से, रोशनदानों से, दोनों दरवाज़ों से बाहर भागे जा रहे हैं। अँधेरा-महल ख़ाली कर रहे हैं। जंग लगे स्प्रिंग की शक्ति छिन गई है, उसका हुक टूट गया है। झाड़ी से निकला पहला जानवर उसे क्षणांश के लिए घूरता है और छोटी-सी छलाँग लगाकर आगे बढ़ जाता है।

डॉक्‍टरी पास करने के बाद उसकी इस गाँव में नौकरी लगी थी। छोटा-सा अस्‍पताल खोला गया था और यहाँ आनेवाली वह पहली डाक्‍टर थी। सरकारी जीप में से उसका सामान निकालकर बाहर रखा गया था, तो थोड़ी देर के बाद ही गाँव की औरतें उसे देखने के लिए वहाँ पहुँच गईं। कितने हाथों ने कुछ समय में ही उसका सामान ठीक से अंदर लगा दिया। बड़े-से घेरे की सुत्‍थन पहने एक बुज़ुर्ग औरत ने उसे प्‍यार से छूते हुए ऊँची आवाज़ में सब औरतों को, जिन्‍होंने रंग-बिरंगी सलवारें पहन रखी थीं, बताया था, “क्‍यों जी अपनी डाक्‍टरणीं ते बहुत सोंहणी हैं।”

सब औरतों ने एक-दूसरे को कुहानियाँ मारकर इस बात को ‘ठीक’ कहा, खिलखिलाकर हँस पड़ीं। उसे पता चल गया, इस गाँव में अब उसे कोई तकलीफ़ न होगी। इस प्रदेश में औरत का सोंहणा होना, सुंदर होना, सब से बड़ा गुण है, बाक़ी बातें बाद की हैं। उसने तब स्‍टोव निकालकर बाहर रखा था। चाय बनाना चाहती थी। तभी बड़ी-सी सुत्‍थनवाली बुज़ुर्ग औरत, जो बाक़ी सब की मुखिया थी, ज़रा तेज़ स्‍वर में बोली थी, “हैं, हैं। क्‍या करती हैं। तू अब रोटी-शोटी पकाने के चक्‍कर में मत पड़ना। यह सरदारों का गाँव है। यहाँ रोटी की कमी नहीं। तुझे बना-बनाया खाना रोज़ मिलेगा। हाय, हाय, देखो नी, यह मुलायम हाथ चुल्‍हे-चौका करेंगे।”

उस बूढ़ी ने उसके हाथ सबको दिखाए, औरतों ने फिर एक-दूसरे को कुहनियाँ मारी थीं, खिलखिलाकर हँसी थीं और इतनी नंगी तारीफ़ें सुनकर वह परेशान हो गई थी। शाम को वह बाहर बरामदे में बैठी थी। सामने के आँगन में कँटीली झाड़ियों और जंगली घास के फैलाव को देख रही थी। तभी गाँव के मर्द खेतों से लौटकर उससे मिलने आए। लम्बी दाढ़ीवाले सरपंच ने उसके सिर पर प्‍यार से हाथ फेरा और फिर एक ने अंदर से चारपाई निकालकर बाहर बिछा दी। सब मर्द, जो पंचायत के सदस्य थे, अपने तहमद सम्भालकर बैठ गए। तब सरपंच ने पूछा था, “क्‍यों बीबाँ, किसी चीज़ की लोड़ तो नहीं?”

“नहीं, सरदारजी।”

“ओए, यह सरदारजी क्‍या हुआ। सीधी तरह से चाचा बोल।”

बाक़ी मर्द ‘ठीक है, ठीक है’ कहकर हँस पड़े थे।

तब उसने अपने नए चाचाजी को बताया कि उसे फूल बहुत अच्‍छे लगते हैं। सामने की झाड़ियाँ और घास कटवाकर अगर साफ़ करवा दी जाए, तो वह शहर से फूलों के पौधे मँगवाकर लगवा लेगी। तब चाचाजी ने उसे डाँटकर बताया था कि वह क्‍यों शहर से फूल मँगवाएगी। वे ख़ुद पौधे मँगवाकर लगा देंगे।

और दूसरे दिन ट्रैक्‍टर मँगवाकर वह आँगन साफ़ करवा दिया गया, ज़मीन में नल लग गया, वह हमवार कर दी गई और चाचाजी ने अपने हाथों से छोटे-छोटे पौधे क्‍यारियों में लगा दिए। वह रात को सोयी तो सोचती रही कि पौधे कब बड़े होंगे, फूल कब लगेंगे। लेकिन नहीं, सुबह उठी तो देखा कि सारी क्‍यारियाँ तहस-नहस हैं, रात को शायद कुछ आवारा पशु छोटे-छोटे पौधे खा गए थे। वह दौड़ती हुई चाचाजी के घर गई। सब कुछ बताया। चाचाजी ने उसी शाम ट्रैक्‍टर भेजकर दो मील दूर शहर से कँटीले तार मँगवाए और आँगन के चारों ओर रात को उस तार की बाउंड्री लग गई। गाँव के बढ़ई ने एक छोटा-सा गेट भी लगा दिया। चाचा ने अपने हाथों से फिर पौधे लगा दिए। एक महीने के अंदर ही रंग-बिरंगे, छोटे-छोटे फूल निकल आए। सारा आँगन जगमगा गया। औरतें पूजा के लिए फूल उससे माँगकर ले जाती हैं, तो तोड़कर देते हुए उसका दिल दहल जाता है। फिर एक दिन उसने नोट किया कि रात को बहुत-से फूल ग़ायब हो जाते हैं। चाचाजी को बताया। वे समझ गए—बच्‍चों की शरारत है। उन्‍होंने गाँव के मिडिल स्‍कूल के हैडमास्‍टर से रात को बातचीत की। सुबह स्‍कूल में प्रार्थना के समय उस पहलवान की तरह स्‍वस्‍थ हेडमास्‍टर ने अपनी दाढ़ी पर हाथ फेरते हुए घोषणा की थी—जो लड़का डाक्‍टरनी के फूल तोड़ेगा, उसे सारा दिन स्‍कूल में मुर्ग़ा बनाकर खड़ा किया जाएगा। फिर अपने हाथों से, बड़ी सुंदर और ख़ुशख़त हिन्दी-पंजाबी में छोटा-सा बोर्ड लिखा— ‘यहाँ फूल तोड़ना मना है।’ और उसे डाक्‍टरनी के आँगन में बिलकुल फूलों के बीच एक ऊँचे डंडे पर कीलों से जड़कर लगा दिया। अब हर दिन, हर महीने उसके आँगन में बसंत रहता है। बाहर गाँव में, खेतों में पतझड़ फैल रहा हो, चाहे जाड़ों की बेरहम हवा…

स्‍टेशन पर लगे लाउडस्‍पीकर पर फिर से घोषणा हो रही है कि गाड़ी एक घंटे में पहुँच जाएगी। वह सत्‍य की गेंद को कसकर मुट्ठी में पकड़े हुए है। दूसरी झाड़ी के पीछे से फिर एक छोटा-सा जानवर बाहर झाँकता है, पल-भर उसकी आँखों में आँखें डालकर देखता है और उस अँधेरे जंगल में से बाहर निकल जाता है। खिड़की के रास्ते बाहर कूदा है न, उसके पट अब भी हिल रहे हैं।

उस शाम बड़े ज़ोर की बारीश हो रही थी। अक्‍तूबर के महीने में बादलों के कारण इस अचानक वर्षा के अँधेरे की चादर उसकी छाती पर, आँगन पर और सारे गाँव में फैल गई थी। बरामदे में रोशनी जलती छोड़कर वह अंदर कम्बल लपेटे कविताएँ पढ़ रही थी। अचानक बाहर का गेट खुलने की आवाज़ आयी। फिर बड़े ज़ोर से नीचे ज़मीन पर कुछ गिरा। वह बाहर निकली। गेट के पास फूलवाली क्‍यारी में एक मोटरसाइकिल गिरी हुई है। कोई उसे उठाकर सीधा करने की कोशिश कर रहा है। पहला एहसास उसे यही हुआ कि मोटरसाइकिल के नीचे दबकर फूलों के सारे पौधे टूट गए होंगे। उसे आँगन में आया देखकर उस आदमी ने मोटरसाइकिल वहीं छोड़ दी और लम्बे क़दम भरता हुआ उसके पास आ गया, “गुड ईवनिंग। आर यू ए डाक्टर?”

उसने ‘हाँ’ में सिर हिलाया। वह आदमी की छाती तक पहुँच रही है, वह कितना लम्बा है? चेहरे पर दाढ़ी है, जो काटकर छोटी की हुई है। वर्षा के कारण सर के बाल माथे पर चिपक आए हैं। वह सिहर गई। डाकू! फिर अपनी बेवक़ूफ़ी पर हैरान हुई। डाकू कहीं सरेशाम अकेले मोटरसाइकिल पर आते हैं। वह अब भी दब गए टूटे पौधों को देख रही है।

“मेरा नाम रंजीत है। जी.टी. रोड पर मोटरसाइकिल फिसल गई। शायद इसके गीयर का तार टूट गया है। पता चला, यहाँ गाँव में एक डाक्टर हैं। मोटरसाइकिल धकेलकर यहाँ लाया हूँ। शायद घुटने पर चोट आ गई है।”

उसने साथवाले कमरे की डिस्‍पेंसरी खोली। वह लँगड़ाता हुआ आगे बढ़कर कुर्सी पर बैठ गया। रंजीत ने जींस पहन रखी है। बहुत तंग है। वह उन्‍हें टाँगों पर से ऊपर चढ़ाने की कोशिश कर रही है, ताकि घुटना नंगा हो सके। लेकिन जींस आधी टाँगों से ऊपर नहीं चढ़ रही है। उसने झुँझलाकर रहा, “जींस उतार दो। तभी मैं घुटने को देख सकती हूँ।”

“नहीं, जींस नहीं उतार सकता। मैंने नीचे अंडरवियर नहीं पहन रखा।”

उसे लगा कि उसके चेहरे पर की दाढ़ी में कोई छोटी-सी मुसकान कौंधी, फिर छिप गई। उसे ग़ुस्सा आ गया, “मुझे इस तरह के घटिया मज़ाक़ बिलकुल पसंद नहीं।”

उस आदमी का चेहरा तन गया है। बड़ी-बड़ी आँखें पूरी खोलकर उसे देख रहा है। फिर धीमी और सधी आवाज़ में बोला, “डोंट बी ए फ़ूल, डाक्‍टर। मैंने सचमुच अंडरवियर नहीं पहना हुआ है।”

फिर रंजीत ने पास पड़ी कैंची उठाकर घुटनों से ज़रा ऊपर जींस काट दी। घुटना बहुत सूज गया। ज़रूर फ़्रैक्चर है। उसने छुआ, तो एक झटके के साथ रंजीत ने टाँग पीछे खींच ली। वह जानती है कि हड्डी टूट जाए तो छूने भर से कितना दर्द होता है। अब वह डर गई कि फ़्रैक्चर का कोई केस उसने अभी तक नहीं किया। कोई बड़ी चोट लग जाए तो शहर के अस्‍पताल में वह मरीज़ों को भेज देती है।

रंजीत उसकी परेशानी समझ लेता है, “आप क्‍या मिलिट्री हॉस्पिटल में फ़ोन कर सकती हैं? वे लोग एम्बुलेंस भेज देंगे।”

“पर गाँव में तो टेलीफ़ोन है ही नहीं।”

“हार्ड लक। देन यू कैन डू योर बेस्‍ट।”

उसने आलमारी खोलकर प्‍लास्‍टर की पट्टियाँ निकालीं, फिर उन्‍हें पानी में डाल दिया। फिर उसे ख़याल आया कि थोड़ी देर के लिए बेहोश कर देनेवाला टीका तो डिस्‍पेंसरी में है ही नहीं। ऐसे इंजेक्‍शन की ज़रूरत तो कभी पड़ी ही नहीं। इसी बीच रंजीत ने उसे बताया कि वह कैप्‍टन है। साथ की छावनी में ही उसका यूनिट है। राधा ने उसे टीका न होने की बात बतायी। रंजीत ने पूछा कि क्‍या टीके के बिना बहुत दर्द होगा। उसने बताया कि बोन सेट करते समय असहनीय पीड़ा होती है। तब रंजीत ने उसका नाम पूछा।

“राधा।”

उसने कहा, “अच्‍छा नाम है।” फिर वह बोला, “डाक्‍टर राधा, आप बोन सेट कर दें। दर्द की चिंता मत करें।”

यह सोचकर उसे अजीब लग रहा है कि मरीज़ डाक्टर को हौसला दे रहा है। उसने धीरे-धीरे घुटने पर उँगलियाँ फेरनी शुरू कर दीं। रंजीत के शरीर में फैलती दर्द की सनसनाहट उसकी उँगलियाँ महसूस कर रही हैं। वह ज़ोर से आँखें बंद किए कुर्सी के साथ सिर लगाकर तनकर बैठा हुआ है। उसकी उँगलियों ने टूटी हुई बोन को महसूस कर लिया है, तलाश लिया है। अब वह उँगलियों से दबाकर बोन सेट कर देती है। रंजीत के ललाट पर पानी की बूँदें चमक रही हैं, बारिश का पानी है या दर्द का पसीना। उसने आसपास देखा। तौलिया नहीं है। राधा ने अपनी बाँह पर पड़े साड़ी के पल्‍लू से उसका पसीना पोंछ दिया। अब वह उसे बातों में लगाना चाहती है।

“कैप्‍टन, आपको फूल अच्‍छे लगते हैं?”

“नहीं। इस बारे में सोचने की कभी फ़ुर्सत ही नहीं मिली। आप जानती हैं हम लोग तो बड़े रफ़ होते…”

कैप्‍टन के वाक्‍य पूरा करने से पहले ही उसने घुटने की बोन को दबा दिया। हलकी-सी थर्राहट उसने उँगलियों में महसूस की। बोन सेट हो गई। रंजीत का पंजा उसकी बाँह में खुभता जा रहा है, खुभता जा रहा है।

“डैम यू डाक्टर, डैम यू।”

रंजीत की उँगलियों की पकड़ ढीली पड़ रही है। उसकी बाँह में ख़ून का दौरा जो क्षण-भर के लिए थम गया था, फिर से शुरू हो गया है। वह बहुत फुर्ती से भीगी हुई पट्टियाँ निकालकर उसके घुटने पर प्‍लास्‍टर कर देती है। अब रंजीत के शरीर में दर्द की लहरें दौड़ना कम हो गई हैं। वह राधा से माफ़ी माँगता है, इतने अशिष्‍ट और कठोर शब्‍द बोलने के लिए। राधा ने बिलकुल बुरा नहीं माना है। वह चाय बनाकर ले आती है।

“कैप्‍टन, आपका आज ही अस्‍पताल में पहुँचना ज़रूरी है। एक्‍स-रे एकदम होना चाहिए, पता नहीं बोन ठीक से जुड़ी है या नहीं।”

रंजीत कहता है कि ठीक है।

उसे ख़ुशी होती है कि कैप्‍टन ने किसी तरह की कोई भावुक बात नहीं की, उसके काम पर तारीफ़ के रिमार्क नहीं दिए। उसने शॉल ओढ़ी और चाचाजी को बुला लायी। चाचाजी ने उसी समय शहर के फ़ौजी अस्‍पताल में ख़बर करने के लिए आदमी भेज दिया। ख़ुद रंजीत के पास बैठ गए, बोले, “पुत्तर, बिलकुल फिकर न कर। हमारी डाक्‍टर बीबाँ ने तेरा घुटना ठीक जोड़ा है। बड़ी समझदार है।”

फिर उन्‍होंने रंजीत से पूछा कि उसकी कौन-सी रेजिमेंट है? क्‍या करता है? रंजीत ने बताया है कि वह पैराट्रूपर है।

चाचाजी के चेहरे पर न समझनेवाला भाव है। रंजीत ने समझाया कि वह छतरियों के द्वारा हवाई जहाज़ से कूदता है। युद्ध के दिनों में शत्रु के क्षेत्र में कूदकर वे सैनिक हलचल की टोह लेते हैं।

चाचाजी ने कहा, “शायद लड़ाई जल्‍दी लग जाएगी। इतने सारे रफ़ूजी यहाँ आ गए हैं। क्‍या करें। लड़ाई तो होनी ही है। पर कोई चिंता नहीं। वाहे गुरू सच का साथ देता है।”

फ़ौजी अस्पताल से एम्बुलेंस पहुँच गई है। सैनिक अर्दली बड़ी मुस्‍तैदी से उसे स्‍ट्रेचर पर डालते हैं, उठाते हैं, बाहर खड़ी एम्बुलेंस में उसे लिटा देते हैं। रंजीत राधा से कहता है, “राधा, मुझे देखने आना। अस्‍पताल में पता चलेगा कि तुम इतनी बीबाँ डाक्‍टर हो, जितनी तुम्‍हारे चाचा कहते हैं।”

दूसरे दिन वह अस्‍पताल गई। पता नहीं रंजीत को देखने अथवा बोन सेट करने के परिणाम को जानने के लिए।

बोन स्‍पेशलिस्‍ट मेजर ने उसे बधाई दी। बोन बिलकुल ठीक सेट हुई है। फिर उन्‍होंने कहा कि रंजीत ‘लकी बास्‍टर्ड’ है। यह बात उन्‍होंने राधा को देखकर कही या बोन ठीक जुड़ने पर, वह इसे समझ न पायी। अब वह रोज़ शाम को उसे अस्‍पताल देखने जाती है। रंजीत का सैनिक अर्दली उसकी क्‍यारी में फूलों के नए पौधे लगा गया है। फिर उसने माँ को पत्र लिखकर बुलाया। रंजीत से मिलवाया। तीन हफ़्तों के बाद रंजीत का प्‍लास्‍टर खुल गया। वह गाँव आया। चाचाजी के घर में ही रंजीत और राधा की मँगनी हुई। राधा के पिता नहीं हैं इसलिए चाचाजी अब बापू बन गए हैं। उन्‍होंने राधा को कठोर हिदायत दी है कि आगे से वह बापू कहकर पुकारा करे…

लाउडस्‍पीकर पर घोषणा हो रही है। गाड़ी आधे घंटे में पहुँच रही है। हवा अब उसके पास नहीं आ रही, क्‍योंकि अब राधा उससे डरती नहीं है। अंदर जो अँधेरा-महल है, उससे हलचल हो रही है। अँधेरे के वासी उसकी आत्‍मा को मुक्‍त कर रहे हैं, बाहर निकल रहे हैं…

युद्ध आरम्भ हो चुका है। रंजीत फ़्रंट पर चला गया है। अब रात को राधा बापू के घर सोती है। बापू, उनकी पत्‍नी और वह ट्रांजिस्‍टर के पास ही बैठे रहते हैं। वह तेरह दिसम्बर की रात थी। वे शत्रु रेडियो-स्‍टेशन पर समाचार सुन रहे थे। घोषणा हो रही है। कैप्‍टन रंजीत और उसके साथी लेफ़्टिनेंट गिल युद्ध-बंदी बना लिए गए हैं। वह उठ जाती है।

वह मुँह पर रज़ाई ओढ़कर लेटी है। बापू पास चारपाई पर बैठे हैं। वे आँसुओं से धुले चेहरे पर हाथ फेर रहे हैं, “न रो पुत्तर, न रो। सब ठीक हो जाएगा। लड़ाई बंद होगी। रंजीत वापस आ जाएगा।”

अब वह सारा दिन ट्रांजिस्‍टर के पास बैठती है। दूसरे दिन पाक रेडियो पर समाचार आता है कि कैप्टन रंजीत पकड़ते हुए ज़ख़्मी हो गया था, वह मर गया है। उसे युद्धबंदी बनाने का समाचार ग़लत था। बापू ट्रांजिस्‍टर बंद कर देते हैं। उनकी लम्बी सफ़ेद दाढ़ी आँसुओं से भीग गई है। वह राधा को बाँहों में भरकर ज़ोर-ज़ोर से रो रहे हैं। लेकिन राधा चुप है। रंजीत के मरने की ख़बर ग़लत है। अभी कल ही तो उसके युद्धबंदी बनने का समाचार आया था।

बापू ने घर अखंड पाठ रखवा दिया है। सारा दिन गुरुग्रंथ साहब पढ़ा जाता है, सफ़ेद कपड़े पहने, सिरों पर दुपट्टे ओढ़, आँखें बंद किए गाँव की औरतें सिर झुकाए बापू के घर बैठी रहती हैं। राधा दिन को अस्‍पताल में काम करती है। फूलों की देख-भाल भी बदस्‍तूर जारी है। रंजीत की रेजिमेंट के कर्नल का शोक-पत्र भी आ गया है। लेकिन वह जानती है कि रंजीत मरा नहीं है। युद्धबंदी हो गया है। उसने अंतरराष्‍ट्रीय रेडक्रासवालों को पत्र लिखे। जवाब आया कि उन्‍होंने सारे युद्धबंदी-शिविरों से पता लगा लिया है, कैप्‍टन रंजीत कहीं नहीं है। ही मस्‍ट बी डैड।

गाँव में मौसम बदलते रहे, पतझड़ आता रहा। लेकिन राधा के आँगन में सारे साल बसंत चहलक़दमी करता रहा, फूल खिलते रहे, पतझड़ से बेख़बर।

आज युद्धबंदी लौट रहे हैं। वह दिल्‍ली स्‍टेशन पर आयी है। अपनी आँखों से देखेगी। चाहे कल अख़बार में लौटनेवालों की जो सूची छपी थी, उसमें रंजीत का नाम नहीं था। लेकिन लेफ़्टिनेंट गिल लौट रहा है। वह रंजीत के साथ पकड़ा गया था। कुछ बताएगा। वह उसे जानती है। रंजीत के साथ एक बार गाँव आया था।

…गाड़ी स्‍टेशन पर पहुँच गई है। भीड़ की प्रतीक्षा का बाँध टूट गया है। लोग गाड़ी के साथ-साथ दौड़ रहे हैं। खिड़कियों से चेहरे बाहर झाँक रहे हैं। हाथ हिल रहे हैं। वह अपने स्‍थान पर खड़ी है। उसे पता है, इस गाड़ी से कोई नहीं, कोई नहीं आएगा। थोड़ी देर के बाद उसे लगता है कि कोई पास आकर रुक गया है। वह सर उठाकर देखती है। एक आँख कपड़े के काले टुकड़े से ढकी हुई है।

“आपने पहचाना नहीं। मैं गिल हूँ। आँख में गोली लग गई थी, इसलिए आई पैच लगा रखा है।”

गिल उसे बाँह थामकर फ़र्स्ट क्‍लास के वेटिंग रूम में ले आया है। वेटिंग रूम बिलकुल ख़ाली है। वह रंजीत के बारे में पूछती है। गिल बताता है कि पहले दिन की घोषणा ठीक थी, वह और रंजीत दोनों शत्रु की सीमा में घायल होकर पकड़े गए थे।

“फिर रंजीत लौटा क्‍यों नहीं?”

गिल चुप है।

वह कठोर आवाज़ में कहती है, “लेफ़्टिनेंट गिल, मैं सच बात जानना चाहती हूँ, प्‍लीज़।”

गिल बोलना शुरू करता है। शब्‍द उसके मुँह से निकलते हैं। बाहर आते ही वे शब्‍द छोटी-छोटी आकृतियाँ, आकार धारण कर लेते हैं। वे शब्‍द रंजीत की, गिल की, शत्रु-सेना के मेजर की और संगीनधारी शत्रु हवलदार की आकृतियों में बदल जाते हैं। शत्रु मेजर इनसे पूछताछ कर रहा है। इंटे‍लीजेंस का मेजर है। भारतीय सेना की गतिविधि जानना चाहता है। दोनों अपना नाम और नम्बर बताने के बाद किसी भी सवाल का जवाब देने से इंकार कर रहे हैं। मेजर दो घंटे से इनसे सवाल कर रहा है। पिछले दो घंटों से वे दोनों चुप हैं। गिल की आँख फूट गई है। उस पर ख़ून जम गया है। रंजीत की दोनों टाँगें ग्रेनेड से ज़ख़्मी हो गई हैं। वह उठकर खड़ा नहीं हो सकता। मेजर को अब ग़ुस्सा आ रहा है। वह हवलदार को कुछ संकेत करता है। और हवलदार आगे बढ़कर संगीन की नोक हलके-से गिल की घायल आँख में चुभो देता है। एक चीख़ बुलंद होती है, ‘नो, यू कांट डू दिस।’ रंजीत में पता नहीं कहाँ से ताक़त आ गई है। वह खड़ा हो गया है। उसने एक लम्बा क़दम उठाया है, मेजर के मुँह पर उसका मुक्‍का पूरे ज़ोर से पड़ा है। मेजर नीचे गिर गया है, उसके मुँह से ख़ून निकल रहा है। शत्रु हवलदार बिजली की तेज़ी से आगे झपटता है, संगीन चमकती है, खच की आवाज़ आती है और संगीन रंजीत की गर्दन के आर-पार हो जाती है। रंजीत वहीं उसी समय मर जाता है। दूसरे दिन इस हत्‍या पर पर्दा डालने के लिए रेडियो पर उसके घायल होने और मरने का समाचार आता है।

गिल बोलना बंद कर देता है। शब्‍द मर जाते हैं। सारी आकृतियाँ, सारे आकार दबे क़दमों से बाहर चले जाते हैं। उसकी आत्‍मा के दरवाज़े से आख़िरी स्‍मृति दबे पाँव बाहर निकलती है। अब वहाँ कुछ नहीं, न अँधेरा, न झाड़ियाँ, न यादों के पशु झाड़ियों में छिपे हुए। है तो केवल साफ़-सपाट बेजान उजाला। अँधेरे का जंगल जो एक साल में उग आया था, सब ग़ायब हो गया है…

वह बस से घर लौट आयी है। पहुँचते-पहुँचते रात हो गई है। वह सीधे अपने घर गई। बापू से कल मिल लेगी। उसने ताला खोला, अँधेरे ने आगे बढ़कर उसका स्‍वागत किया। उसने लाइट जला दी, अँधेरा चुपचाप बाहर आँगन में जाकर बैठ गया। वह लेट गई है। खिड़कियों, दरवाज़ों पर दस्‍तकें हो रही हैं। तेज़ हवा चल रही है। फिर किसी पूर्व सूचना के बिना ही झटके के साथ बारिश शुरू हो गई है। बारिश तेज़ है, तो हवा उससे भी तेज़। पानी की बौछारों को हवा अपने पंखों से उठाती है और फिर बड़ी बेरहमी से दीवारों के साथ, दरवाज़ों के साथ, खिड़कियों के साथ पटक देती है। पानी सर धुन रहा है, लेकिन हवा बेरहम है। दो घंटे के बाद वर्षा और हवा द्वंद्व-युद्ध कम होता है, कमज़ोर पड़ता है। हवा ने पानी को पछाड़ दिया है।

तभी बाहर का गेट खुलने की आवाज़ आती है। वह झपटकर उठती है। बाहर निकलकर बरामदे की लाइट जलाती है। गेट पर कोई नहीं। हवा जाते-जाते गेट का कुंडा खोल गई है। वह चारों तरफ़ देखती है। हवा ने फूलों के सारे-के-सारे पौधे तहस-नहस कर दिए हैं। छोटे-छोटे पौधे, टहनियाँ ज़मीन पर लेटी हुई हैं। बड़े-से डंडे पर लगा बोर्ड नीचे गिर गया है, जिस पर लिखा हुआ था— ‘यहाँ फूल तोड़ना मना है।’ फूल टूटने पर, तहस-नहस होने पर उसे कोई ग़ुस्सा नहीं आता। हवा बेचारी का क्‍या क़सूर। उसे क्‍या पता कि यहाँ फूल तोड़ना मना है। यह सूचना और बोर्ड उसके लिए अर्थहीन हैं, क्‍योंकि हवा पढ़ नहीं सकती।

अमृता प्रीतम की कहानी 'यह कहानी नहीं'

Book by Swadesh Deepak: