‘एक दिन लौटेगी लड़की’ से

लड़की बैठी है हँसी के बारूद पर
उसकी हँसी में
न स्मृति है, न कारण, न हिंसा
सिर्फ़ अँधेरे का एक डर है
जो ठीक उसके पीछे खड़ा है

उसकी हँसी में चमकते हैं वे फूल जो उसने देखे नहीं
वे बच्चे, जिनकी चीख़ें उसके कान सुनते हैं अक्सर
वे सपने, जो उसके देखे-अनदेखे
पलकों से खेलते हैं धूप-छाँह

उसके भीतर हँसते हैं उसके फेफड़े गुदगुदी से
दिल फैलता है उसका भोलेपन से
पेट हँसता है उसका सबके साथ
सबको हँसता देखकर

टाँगें हिलती हैं उसकी ही-ही-ही
कुंद होने लगता है उसका दिमाग़ ठहाकों से भरकर
एक दौरा पड़ता है उसके शरीर की नस-नस में
उसके रोके नहीं रुकती यह हिंसा
जो नसें उसकी कर रही हैं एक-दूसरे के विरुद्ध

पहले-पहल ठिठकती है उसकी हँसी
आँख की कोरों पर
फिर रुकती है फैली पुतलियों के पास
डूब गई हैं नींद में उसकी
हँसते-हँसते थक गई आँखें

ठहरी रह गई है हवा
उसके फेफड़ों में विस्मित

क्या हुआ लड़की? तुम्हें क्या हुआ?

साँस की नली से
उतरती हैं सीढ़ियाँ
उसकी हँसी की गूँजें,
थामकर एक-दूसरी का हाथ
डरते-डरते

गिरती है धप्प से
एक चीज़ अँधेरे खड्ड में
बहुत सारा रुदन पथराया पड़ा है
वहाँ पर

कुछ रोने थे जो लड़की ने कभी नहीं रोए
कुछ रोने थे जिन्हें न रोने की ज़िद थी उसमें
कुछ थे जो उसे हर क़ीमत पर
रुलाना चाहते थे

उसकी हँसी ने जगा दी है सबके भीतर की हिंसा

सो गई है थककर
हँसनेवाली लड़की।

गगन गिल का निबन्ध 'देह की मुण्डेर पर'

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