सारे आसमान के नीचे, एक दिन
शीशों के पर्दे होंगे
तुम, लगभग देख लोगे पूरा आसमान
बाज़ों की हल्की उड़ान
तुम, लगभग महसूस करोगे
अपनी पेशानी पर बारिश की टपकन, किरणों की चुभन

पूरी पृथ्वी के ऊपर, एक दिन
रूई के खेत होंगे
तुम, लगभग पोंछ लोगे छलकते ख़ून
तौलते रह सकोगे, ज़ख्मों को साँस रहने तक

तमाम शहर की सड़कों पर, एक दिन
दौड़ेगा कोई खूँख़ार जानवर
रेंगेगा भयानक अजगर
तुम भी दौड़ोगे, फुफकारोगे,
लगभग बचा लोगे मनुष्यता को निगलने से, खींचकर उनकी अंतड़ियों से

किसी दिन, पसीजेगा शीशा : ख़ून टपकेगा : मैं समझूँगा लगभग बारिश
महकेगी रूई : मैं सूँघूँगा लगभग गुलाब
दम्भ भरेगी मनुष्यता : मैं भरूँगा : किसी दिन और…

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विशेष चंद्र ‘नमन’
विशेष चंद्र नमन दिल्ली विवि, श्री गुरु तेग बहादुर खालसा कॉलेज से गणित में स्नातक हैं। कॉलेज के दिनों में साहित्यिक रुचि खूब जागी, नया पढ़ने का मौका मिला, कॉलेज लाइब्रेरी ने और कॉलेज के मित्रों ने बखूबी साथ निभाया, और बीते कुछ वर्षों से वह अधिक सक्रीय रहे हैं। अपनी कविताओं के बारे में विशेष कहते हैं कि अब कॉलेज तो खत्म हो रहा है पर कविताएँ बची रह जाएँगी और कविताओं में कुछ कॉलेज भी बचा रह जायेगा। विशेष फिलहाल नई दिल्ली में रहते हैं।