हर बार लौट पाने का निश्चय
कहाँ बचा पाया हूँ अब

दर्द की हवा भर पाए
उससे पहले ही
ख़यालों की नाक में एक बेचैन गुदगुदी कर
हर प्रतीक्षा को छींक देता हूँ मैं

ख़ुद से दूर भागकर
धरातल के दूसरे सिरे से
ख़ुद के नज़दीक आता हूँ

गुनगुनाता हूँ
बढ़ जाता है मेरे गीतों का तापमान
हरेक स्वर के साथ मेरा घनत्व घट जाता है

आकाश के गुम्बद में लटका दूँगा अपनी आँखें
किसी चमगादड़ की तरह

मैं रात में बरसूँगा
अपने गिरने की गति में सारी हवाओं को चूमकर
भर ले जाऊँगा उन्हें धरातल के किसी छिद्र में
ख़ुद के साथ…

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विशेष चंद्र ‘नमन’
विशेष चंद्र नमन दिल्ली विवि, श्री गुरु तेग बहादुर खालसा कॉलेज से गणित में स्नातक हैं। कॉलेज के दिनों में साहित्यिक रुचि खूब जागी, नया पढ़ने का मौका मिला, कॉलेज लाइब्रेरी ने और कॉलेज के मित्रों ने बखूबी साथ निभाया, और बीते कुछ वर्षों से वह अधिक सक्रीय रहे हैं। अपनी कविताओं के बारे में विशेष कहते हैं कि अब कॉलेज तो खत्म हो रहा है पर कविताएँ बची रह जाएँगी और कविताओं में कुछ कॉलेज भी बचा रह जायेगा। विशेष फिलहाल नई दिल्ली में रहते हैं।

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