कई-कई बार ये फूल नहीं लगते
ये लगते हैं –
तुम्हारा मौन
तुम्हारा संवाद
तुम्हारी आँखें
तुम्हारी ऊँगलियाँ

कई बार मैं इन्हें उगा लेना चाहती हूँ, अपने मन की चारदीवारी में!

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