माँ का झूठ

‘Maa Ka Jhooth’, a poem by Sushma Saxena

माँ हर विवाह में
पहनती है एक वही साड़ी
माँ के अपने विवाह की बनारसी साड़ी

माँ कितनी भी निर्विकार दिखे
या उदासीन रहे,
साड़ी के बाज़ार में
कभी एक हलकी-सी चमक
उसकी आँखों में भी आती है

जब देखती है छूकर
अलट-पलटकर
कोई आकर्षक रंगीली साड़ी
होंठ आपस में कसकर दबा लेती है, बटुए की तरह।
सोचती है,
फिर बड़प्पन का भारी कम्बल
ओढ़ा देती है अपनी आवाज़ को।
हाँ…
कहती है-
नहीं लेनी है मुझे
बड़ी महंगी है
दुकानदार ठग है
लूटता है,
नहीं लेनी है मुझे
बहुत पड़ी हैं बक्से में साड़ियाँ।

चलो
माँ बच्चे का हाथ पकड़कर कहती है
बच्चा जानता है, माँ झूठ कहती है
माँ को अच्छी लगी है साड़ी
और माँ के बक्से में नहीं पड़ी हैं साड़ियाँ
बच्चा जानता है,
माँ झूठ कहती है…
सच तो ये है कि
माँ के पास न बक्सा है, न साड़ियाँ।
न ही माँ के पास होते हैं रुपये
माँ हर विवाह में पहनती है
वही एक बदरंग पुरानी बनारसी साड़ी
माँ के अपने विवाह की साड़ी।