‘Machhliyaan’, a poem by Gaurav Tripathi

मछलियाँ बड़ी भीषण देशभक्त होती हैं, वे देश त्यागने से प्राण त्यागना बेहतर समझती हैं

और उनका देश – पानी
झेलता है प्रकृति की मार
इन्हें देने को अधिकार
जीवन का आधार

पानी को मतलब नहीं मछलियों के रंग से
जाति से, धर्म से
वो नहीं माँगता इनसे कोई प्रमाण-पत्र

मछलियाँ नहीं होती हैं सावधान
गाने को राष्ट्रगान
पानी का नहीं होता कोई राष्ट्रीय ध्वज
वो नहीं लेता मछलियों से कोई टैक्स
वो बस चाहता है कि मछलियाँ रहें
और उनके साथ रहें मूंगे, केकड़े, कछुए, साँप
छिड़े सहजीवन का आलाप
मछलियाँ नहीं देतीं अपनी देश-भक्ति का प्रमाण,
देश में रहते हुए
लेकिन फिर भी
वो जी नहीं पातीं
अपने देश के बाहर

क्योंकि मछलियाँ…
बड़ी भीषण देशभक्त होती हैं!

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