मध्यमवर्गीय बड़े बेटे,
इन्हें भी शौक होता है स्पोर्ट्स बाइक का,
पर सच कहूँ तो सिर्फ बाइक का।
साईकल के पैडल लगाते हुए,
ट्यूशन पढ़ाने जाते हुए,
जब ये देखते हैं, अपने से 5-6 बरस छोटे लौंडो को बाइक दौड़ाते,
तो इन्हें भी होती है ईर्ष्या,
ये भी कुढ़ते है अन्दर,
फिर अधिक जोर से मारते हैं पैडल।।

जब सामने से स्कूटी पे आती किसी कन्या से मिलती है इनकी नज़र,
तो चमकती है इनकी भी आँखे,
ये हमेशा नकारते हैं कि इन्हें नहीं बनना डूड्स,
पर सच कहूँ तो ये भी दिखना चाहते हैं डूड्,
पर नहीं देती इनको इसकी इजाजत,
इनकी खाली जेब।
फिर हताशा में कह बैठते हैं कि हम देसी ही ठीक हैं।

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राहुल सिंह चारण
नए लोगो से मिलने का शौकीन, घुमक्कड़, फक्कड़ , घोर निराशावादी

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