‘ई. वी. रामासामी पेरियार : दर्शन-चिंतन और सच्ची रामायण’ से

पुरुष स्त्री को अपनी सम्पत्ति मानता है और यह नहीं मानता कि उसके ही समान स्त्री की भी भावनाएँ हो सकती हैं। महिलाओं को शिक्षा प्राप्त करने से क्यों रोका गया? ताकि उन्हें उनकी मुक्ति से वंचित रखा जा सके और इस बहाने उन्हें दासी बनाया जा सके और साबित किया जा सके कि वे सोचने-विचारने या कोई कार्य करने में सक्षम नहीं हैं।

ज़मींदार अपने नौकरों और ऊँची जाति के लोग नीची जाति के लोगों के साथ जिस प्रकार का व्यवहार करते हैं, पुरुष उससे भी बदतर व्यवहार स्त्री के साथ करता है। ज़मींदार अपने नौकरों के साथ और ऊँची जाति के लोग नीची जाति के साथ तभी ऐसा बुरा बर्ताव करते हैं, जब इन्हें उनसे ख़तरा महसूस होता है। लेकिन, पुरुष महिलाओं के प्रति उनके जन्म से लेकर मृत्यु तक क्रूर व्यवहार करते हैं। भारत में महिलाएँ हर क्षेत्र में अस्पृश्यों से भी अधिक उत्पीड़न, अपमान और दासता झेलती हैं। चूंकि हम इस बात को समझ नहीं पाते कि स्त्री की पराधीनता सामाजिक विनाश की ओर ले जाती है, इसीलिए, अपनी सोचने-विचारने की सामर्थ्य के चलते जिस समाज को विकास की सीढ़ियाँ चढ़नी चाहिए; वह दिन-ब-दिन पतन की ओर बढ़ता जाता है।

प्रत्येक महिला को एक उपयुक्त पेशा अपनाना चाहिए, ताकि वह भी कमा सके। अगर वह कम-से-कम ख़ुद के लिए आजीविका कमाने में सक्षम हो जाए, तो कोई भी पति उसे दासी नहीं मानेगा।

पुरुष के लिए एक महिला उसकी रसोइया, उसके घर की नौकरानी, उसके परिवार या वंश को आगे बढ़ाने के लिए प्रजनन का साधन है और उसके सौंदर्यबोध को संतुष्ट करने के लिए एक सुंदर ढंग से सजी गुड़िया है। पता कीजिए, क्या इनके अलावा उनका उपयोग अन्य कार्यों के लिए भी हुआ है?

महिलाओं की दासता केवल पुरुषों के कारण है। पुरुषों की यह धारणा कि ईश्वर ने पुरुष को श्रेष्ठ शक्तियों से युक्त और स्त्री को उसकी ग़ुलामी करने के लिए बनाया है और परम्परागत तौर पर स्त्रियों द्वारा इसे सत्य मानकर इसकी स्वीकार्यता—ये ही स्त्री की दासता को बढ़ावा देने वाले कारक तत्त्व हैं।

विवाह से पूर्व लड़का और लड़की की जोड़ी दोनों के रंग-रूप की संगतता, आपसी स्नेह और सही समझ तथा समान शिक्षा के आधार पर नहीं मिलायी जाती, बल्कि यह देखा जाता है कि क्या लड़की आज्ञाकारी होगी और लड़के की इच्छानुसार आचरण करेगी? लगभग उसी तरह से, जैसे गाय-बैल आदि ख़रीदते समय उन्हें देखा-परखा जाता है।

मंगल-सूत्र का निहितार्थ यह है कि जब लड़का इसे लड़की के गले में बांधता है, तभी से वह उसे अपनी दासी मान लेता है और लड़की भी उसकी दासी बनना स्वीकार कर लेती है। इस प्रकार पति अपनी पत्नी के प्रति चाहे जैसा भी व्यवहार करे; किसी को उसे रोकने-टोकने का अधिकार नहीं है और न ही उसके दुर्व्यवहारों के लिए दंड का प्रावधान है।

आज की मध्यम वर्गीय महिलाएँ अपनी शिक्षा, धन, व्यवहार-कुशलता सम्बन्धी ज्ञान, सम्मानित रिश्तेदार और एक आरामदायक जीवन जीने के बावजूद बहुत-ही पारम्परिक ढंग से व्यवहार करती हैं, जिससे उनमें देहाती लड़कियों से भी ज़्यादा पिछड़ापन झलकता है। यह दुःख की बात है। ऐसी महिलाओं द्वारा जन्मे और उनके संरक्षण में पलने-बढ़ने वाले बच्चों में मानवीय गरिमा का भाव कैसे आएगा?

हमारे समाज की महिलाओं को स्वयं को जन्म से ही दासी मानने की प्रवृत्ति बदलनी चाहिए।

महिलाओ! साहसी बनिए। यदि आप अपने आचार-विचार में बदलाव लाती हैं, तो आपके पति और अन्य पुरुषों को भी बदलने में आसानी होगी। पुरुष आप पर यह आरोप लगाते हैं कि आप पिछड़ी हैं। अपने आप पर यह आरोप मत लगने दीजिए। अपनी स्थिति को यूँ मज़बूत बनाइए कि भविष्य में इसकी बजाय कि आपको ‘अमुक व्यक्ति की पत्नी’ के रूप में पहचाना जाए; आपके पति को ‘अमुक महिला के पति’ के तौर पर चिह्नित किया जाए।

पति का लाड़-प्यार पाने वाली महिलाएँ, जिनको गहनों और परिधानों का अत्यधिक मोह होता है; जो स्त्रियोचित सौंदर्य और फ़ैशन के आकर्षण से अभिभूत हो जाती हैं तथा जो धनाढ्य और अभिमानी होती हैं; वे अपनी इसी निष्क्रिय अवस्था में संतुष्ट रहेंगी। वे दुनिया में कोई सुधार लाने में सहायक सिद्ध नहीं होंगी। महिलाओं को उपहास की वस्तु समझने तथा पुरुष के मन बहलाने की चीज़ मानने के पीछे मुख्य कारण यह है कि वे ख़ुद ही अभद्र ढंग से व्यवहार करती हैं। जो महिलाएँ ख़ुद को फ़ैशनेबल और आधुनिक समझती हैं, वे मात्र बढ़िया परिधान तथा आभूषण पहनकर आकर्षक दिखने से ही स्वयं को सभ्य मानती हैं। उन्हें इस बात का एहसास नहीं होता कि पुरुषों के साथ समान दर्जे का सम्बन्ध ही वास्तविक सभ्य जीवन का आधार है।

‘प्राथमिक शिक्षक’ शब्द को सर्वप्रथम महिलाओं के लिए प्रयोग में लाया जाना चाहिए। क्योंकि, 6 से 7 वर्ष से कम आयु वाले बच्चों के लिए तो असल में वे ही प्राथमिक शिक्षक हैं।

हिंदू-धर्म में ज्ञान की और धन की देवियों को पूजा जाता है। फिर ये देवियाँ महिलाओं को शिक्षा तथा सम्पत्ति का अधिकार प्रदान क्यों नहीं करतीं? महिलाओं को तर्कसंगत ज्ञान और वैश्विक मामलों से सम्बन्धित पर्याप्त शिक्षा दी जानी चाहिए। उन्हें ऐसे साहित्य, इतिहास या कहानियों से दूर रखा जाना चाहिए, जो अंधविश्वास और भय को जन्म देती हैं। महिलाओं की पराधीनता के कई कारणों में से प्रमुख कारण यह है कि उन्हें सम्पत्ति का अधिकार नहीं है।

समाज में पुरुषों की प्रधानता ने उन्हें निरंकुश बनाया है। इसका एक प्रमाण यह है कि हमारी भाषाओं में पुरुष की ‘शुचिता’ के लिए कोई लक्षण निर्धारित नहीं किया गया है। शुचिता के नाम पर पति द्वारा पत्नी के प्रति बरती जाने वाली क्रूरता को, जिसे पत्नी को हिंसा के रूप में भी सहन करना पड़ता है, समाप्त कर देना चाहिए।

अगर किसी महिला को सम्पत्ति का अधिकार और अपनी पसंद से किसी को चुनने तथा प्रेम करने की स्वतंत्रता नहीं है, तो वह पुरुष की स्वार्थ-सेवा करने वाली एक रबड़ की पुतली से ज़्यादा और क्या है?

‘शुचिता’ को केवल स्त्रियों पर लागू करने और पुरुष को इससे मुक्त रखने का हठ, पूर्वाग्रह-युक्त व्यक्तिगत स्वामित्व पर आधारित धारणा है। स्त्री पुरुष की सम्पत्ति है; यही विचार पत्नी की वैध स्थिति निर्धारित करता है।

यदि हमारा सम्पूर्ण साहित्य न्याय और अनुशासन-बद्ध आचरण के निमित्त रचा गया है, तो महिलाओं पर लागू सभी नियम-क़ानून पुरुषों पर भी समान रूप से लागू नहीं होने चाहिए?

संसार में यही दावा किया जाता रहा है कि स्वतंत्रता तथा साहस केवल ‘पौरुष’ के लक्षण हैं। अतः पुरुष समाज ने यह निश्चय कर लिया कि ये ही गुण ‘पुरुष की श्रेष्ठता’ को परिभाषित करते हैं। जब तक दुनिया में पुरुष की श्रेष्ठता क़ायम रहेगी, महिलाओं की पराधीनता जारी रहेगी। निश्चित तौर पर महिलाएँ तब तक स्वतंत्रता हासिल नहीं करेंगी, जब तक कि वे पुरुष-वर्चस्व की रीति को समाप्त नहीं कर देतीं। पुरुष को अपनी यौन-साथी चुनने की छूट और उसे जितनी मर्ज़ी, उतनी पत्नियाँ वरण करने की अनुमति स्वच्छंद सम्भोग का कारण बनती है। लोग महिलाओं की स्वास्थ्य-सुरक्षा और पारिवारिक सम्पत्ति के संरक्षण के उद्देश्य से गर्भ-निरोध का समर्थन करते हैं। लेकिन, हम इसकी वकालत महिलाओं की मुक्ति के लिए करते हैं।

यदि किसी पुरुष को किसी महिला पर दावा करने का अधिकार है, तो एक महिला को भी पुरुष पर दावा करने का अधिकार होना चाहिए। अगर महिला पर पुरुष को पूजने के नियम थोपे जाते हैं, तो पुरुष पर भी महिला को पूजने के नियम लागू किए जाएँ।

महिलाओं की मुक्ति के लिए पुरुष का तथाकथित ‘प्रयास’ वास्तव में महिलाओं की दासता को ही जारी रखता है और उसके निवारण के रास्ते में ख़लल डालता है। पुरुषों द्वारा यह दिखावा कि वे महिलाओं का सम्मान करते हैं और उनकी स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करते हैं; उन्हें धोखे में रखने के लिए महज़ एक चाल है। क्या आपने कभी, कहीं भी सियार को मुर्ग़ी तथा मेमने को या बिल्ली को चूहों को बख़्शते हुए देखा है? या फिर पूँजीपतियों को श्रमिकों का उद्धार करते देखा है?

महिलाओं को दासों की तरह घरेलू काम-काज, जैसे—फ़र्श की सजावट (उत्तर भारत में रंगोली तथा दक्षिण भारत में कोलम), उपले बनाना, बर्तन मांजना, सामूहिक नृत्य (कुम्मी) और कोलाट्टम के साथ नृत्य करने का प्रशिक्षण मत दीजिए।

आज हमारा अंधविश्वास हमारे समाज के दोषों और अधोगति का मुख्य कारण है। यदि हमारे समाज की महिलाओं के बीच इतना अंधविश्वास है, तो उनके बच्चों का क्या होगा? यदि महिलाओं की ओर से किसी सुधार-कार्य की पहल की जाती है, तो उसे ऊर्जा मिलती है। यदि बाल-विवाह पर रोक लगा दी जाए और तलाक़, विधवाओं के पुनर्विवाह, अंतर्जातीय विवाह और अपनी पसंद के अनुसार विवाह करने के अधिकार के लिए प्रावधान बना दिए जाएँ, तो समाज में व्याप्त वेश्यावृत्ति 90 प्रतिशत समाप्त हो जाएगी।

पुरुष स्त्री के बिना रह सकता है। लेकिन, हर स्त्री सोचती है कि वह पुरुष के बिना नहीं रह सकती। यदि हम इसके कारण पर ग़ौर करें, तो पाएँगे कि गर्भधारण से जुड़ीं समस्याओं के चलते महिलाएँ यह जताने में असमर्थ होती हैं कि वे पुरुषों के बिना रह सकती हैं। चूंकि, पुरुषों पर ऐसा कोई भार नहीं होता। इसलिए, समाज में उनकी स्थिति इतनी दृढ़ है कि उन्हें यह घोषित करने में कोई आपत्ति नहीं होती कि वे महिलाओं के बिना रह सकते हैं। इसके साथ ही मातृत्व से सम्बन्धित समस्याएँ महिलाओं को दूसरों की सहायता लेने के लिए विवश कर देती हैं; जिससे पुरुष वर्चस्व को बढ़ावा मिलता है। इसलिए, महिलाओं की असली मुक्ति के लिए उन्हें संतानोत्पत्ति की कष्टप्राय बाध्यता से पूरी तरह मुक्त कर देना चाहिए।

पेरियार का लेख 'पति-पत्नी नहीं, बनें एक-दूसरे के साथी'

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