रोज़ जब धूप पहाड़ों से उतरने लगती
कोई घटता हुआ, बढ़ता हुआ, बेकल साया
एक दीवार से कहता कि मिरे साथ चलो

और ज़ंजीर-ए-रिफ़ाक़त से गुरेज़ाँ दीवार
अपने पिंदार के नश्शे में सदा इस्तादा
ख़्वाहिश-ए-हमदम-ए-देरीना पे हँस देती थी

कौन दीवार किसी साए के हम-राह चली
कौन दीवार हमेशा मगर इस्तादा रही
वक़्त दीवार का साथी है न साए का रफ़ीक़

और अब संग-ओ-गिल-ओ-ख़िश्त के मलबे के तले
उसी दीवार का पिंदार है रेज़ा रेज़ा
धूप निकली है मगर जाने कहाँ है साया!

Previous articleउल्टी वा की धार!
Next articleआईना
अहमद फ़राज़
अहमद फ़राज़ (१४ जनवरी १९३१- २५ अगस्त २००८), असली नाम सैयद अहमद शाह, का जन्म पाकिस्तान के नौशेरां शहर में हुआ था। वे आधुनिक उर्दू के सर्वश्रेष्ठ रचनाकारों में गिने जाते हैं।

1 COMMENT

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here