मैं बहाने बनाता हूँ
ठीक वैसे ही-
जैसे अवसाद से ग्रसित कोई व्यक्ति
यथार्थवादी होने का,
जैसे अखण्ड ब्रह्मचारी
अनासक्ति का
जैसे कि जनरल बोगी में लेटे हुए लोग
दूसरे यात्रियों को देखकर,
बीमार होने का बहाना करते हैं
जिस प्रकार कविता छल करती है
पूर्ण होने का
दुःख बहाना करता है
शाश्वत होने का,
कोई एक भाषा
वंचना करती है अपनी शब्दावली से-
ब्रह्माण्ड के सभी अनुभवों को
व्यक्त कर देने का,
जिस तरह दार्शनिक आडम्बर करते हैं
सम्पूर्ण ज्ञान का
हर क्रांतिकारी विचारधारा पाखण्ड करती है
समतावादी होने का,
कवि दम्भ करता है
संसार की प्रत्येक सम्वेदना से
समानुभूति का,
पकड़े जाने पर चोर प्रपंच करता है
अनभिज्ञ होने का,
जैसे वेश्या स्वांग करती है
पूर्ण उन्माद का,
नास्तिक ढोंग करता है
अनीश्वरवादी होने का,
मनुष्य, श्रेष्ठतम
परिपक्व जीव होने का,
और ईश्वर, अंततः
परम सत्य होने का।

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