मैं चाहती हूँ

‘Main Chahti Hoon’, a poem by Harshita Panchariya

मैं चाहती हूँ तुम
मुझे ऐसे चूमो
जैसे चूमती है हवा
फूलों को
और बिखेर देती है
अपनी गंध।

मैं चाहती हूँ तुम
मुझे ऐसे चूमो
जैसे चूमती है नदी
पाषाणों को
और अंकित कर देती है
अपने चिह्न।

मैं चाहती हूँ तुम
मुझे ऐसे चूमो
जैसे चूमती है माँ
चोट को
और समाप्त कर देती है
सारी पीड़ा
एक फूँक में।

मैं चाहती हूँ तुम
मुझे ऐसे चूमो
जैसे चूमती है
बारिश धरा को
और समाप्त कर लेती है
अपना अस्तित्व।

क्योंकि मैं जानती हूँ
तुम्हारा चूमना समाप्त कर देगा
उस ‘पाषाण’ हृदय के
‘अस्तित्व’ की
‘गंध’ को जिसकी
‘पीड़ा’ की फूँक ने
पसारे हैं
उदासी के अंधेरे।
और ये उदासी के अंधेरे
बंद आँखों के अंधेरों से
ज़्यादा स्याह नहीं…

मुझे इन स्याह होती रातों में
डूबना है
हाँ, मुझे तुम्हें चूमना है।

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