‘Main Hi Hoon’, a poem by Niki Pushkar

मेरी कविताओं में
अक्सर मेरा अन्वेषण होता रहा है
नायिका के चरित्र में मेरे चरित्र का
अनुसंधान किया जाता रहा
संकेतात्मक प्रश्न उठाए गए
अक्सर कुरेदा भी गया
हर तरह से मेरी नायिका को
परोक्ष रूप से
‘मैं’ की मान्यता थोपी गई
हे सुधीजन!
हाँ, वह मैं ही होती हूँ
मेरी कविता की नायिका मैं ही हूँ
उसके चरित्र को वर्णित करने में
मैं भी उस पीड़ा से गुज़रती हूँ
उस समय हम पृथक नहीं रहते
एक हो जाते हैं
दो व्यक्ति एक समय में,
एक ही दर्द से गुज़रे
तो पीड़ा भी एक हो जाती है
और पीड़ा का चरित्र भी…