मैंने कभी फूल नहीं तोड़े,
जब भी उन्हें छुआ
अपनी उंगलियों के पोरों पर
एक सतर्क कृतज्ञता महसूस की

मैंने किताबों में निशानदेही नहीं की कभी
नहीं मोड़ा कोई पन्ना
अपनी पसंदीदा पंक्तियों तक
दोबारा लौटने के लिए

मैंने कभी किसी को भी नज़र-भर नहीं देखा
और इस तरह दूसरों के दर्द को
अपनी आँखों के नमक से बचाते हुए चला,
अजनबीयत को सदा सम्मान दिया
प्रेम को हमेशा विदा के बाद बचे हुए सब कुछ में पाया

मैंने अपनी चप्पलें घर के बाहर उतारीं हमेशा
घर से बाहर जब भी निकला, सर झुकाकर निकला
अपने तमाम लिखे हुए की सारी आलोचना को सच मान
जुटा रहा जिए हुए के संशोधन में

मैंने ख़ुद से बहुत बचाया इस दुनिया को
और दुनिया ने बदले में मुझे ख़ुद से आज़ाद रखा

मैं जहाँ कहीं से लौटा
ख़ाली लौटा
और सारी उम्र ख़ाली जगहों को
अपनी हैरतों से भरता रहा।

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