बहुत ही लापरवाह रहा हूँ मैं
अपनी देह को लेकर
पहनने-ओढ़ने का शऊर भी नहीं रहा कभी
मुझे ध्यान नहीं रहता
कब बढ़ जाते हैं मेरे नाख़ून
झड़ने लगे जब बाल
मुझे लगा, शहर मुझे चाट रहा है
आँखें जब हुईं कमज़ोर
मुझे लगा, धूल ने स्थायी जगह बना ली है मेरी पुतलियों में
पहली बार जब लेटा हरी चादर पर ईसीजी के लिए
मुझे लगा, मेरी धड़कनों पर हवाई जहाज़ का असर है

मेरा जितना साथ शहर की तंग गलियों ने दिया
उतना साथ नहीं दिया मेरे जूतों ने
एक जैसी रंगी, बिछी हुईं सड़कें
मुझे अक्सर गुमराह कर जाती हैं

मैं नहीं लड़ता
खाने के स्वाद को लेकर अब
नमक उठाकर
छिड़क लेता हूँ कभी दाल में
कभी हल्का-सा गर्म पानी मिलाकर
खा लेता हूँ सब्जी
स्वाद के लिए लड़ना
भूख का मज़ाक़ उड़ाना है
जिसकी इजाज़त मुझे मेरा देश नहीं देता

मेरी दुनिया हमेशा से बहुत छोटी रही
मैं नहीं सम्भाल पाता अधिक रिश्तें
हमारा समाज जो बहुत जल्दी किसी निर्णय पर पहुँच जाता है
उस समाज से मुझे कुछ ही लोग चाहिए
जो ठहरना जानते हों

जब भीतर शोर होता है
आदमी बहरा हो जाता है
और कई बार गूँगा भी
भीतर का शोर किसी और को सुनायी नहीं देता
शोर कैसा भी हो
उसे सुना नहीं समझा जाना चाहिए

सच कह रहा हूँ—
हम बहुत हिंसक होते जा रहे हैं
हमारी सभी इंद्रियाँ पहले से कहीं ज़्यादा हमलावर हुई हैं
हर जगह उग आएँ हैं नाख़ून
ऐसे हिंसक समय में
लगातार कोशिश करते हुए
मैं ख़ुद को हत्यारा होने से बचा रहा हूँ…

गौरव भारती की कविता 'स्थायी पता'

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