मैं फिर फिर लौटूँगा

‘Main Phir Phir Lautoonga’, a poem by Rahul Boyal

मैं फिर फिर लौटूँगा
मगर तिजोरी जैसे घर
और कोठरी जैसे दफ़्तर को
भूलना चाहूँगा
मैं कहीं और लौटूँगा

मैं उदास बच्चों के लिए खिलौना
नवजातों के लिए खस-खस
रोती हुई लड़की के लिए कंधा
सहमी हुई औरत के लिए ढाढ़स
बनकर लौटूँगा
मैं फिर फिर लौटूँगा।

मैं फिर फिर लौटूँगा
मगर आदम की इस जात में
और चमड़े के इस गात में
प्रविष्टि न चाहूँगा
मैं कहीं और लौटूँगा

यहाँ के दु:खों से अलगाव कर
मृत्यु से थोड़ा मोल-भाव कर
समय के उस पार
हर दम जीने को तैयार
गुनगुनाता जाऊँगा
मैं फिर फिर लौटूँगा।

मैं फिर फिर लौटूँगा
ऋतुएँ मुझे बसन्तराज पुकारेंगी
मौसम सब सुहाना कहके बुलायेंगे
मैं बादलों के जिस्म सा फ़ानी बन
इस धरती की ज़िन्दगानी बन
भीगोता चलूँगा
मैं गिर गिर उठूँगा

इस बार नाराज़ हैं बहुत साथी
कि मेरे चेहरे पर मुस्कान नहीं आती
अबके जब लौटूँगा
मुस्कुराता मिलूँगा
मैं फिर फिर लौटूँगा।

यह भी पढ़ें:

विशेष चंद्र नमन की कविता ‘लौटूँगा धरती’
पल्लवी मुखर्जी की कविता ‘लौट आया प्रेम’

Books by Rahul Boyal: